अवैध गतिविधि: गंदी मिट्टी से निकाल रहे सोना

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गंदा है पर धंधा है…….

-बाथरूम गटर, नाली, श्मसान की मिट्टी को लाखों में खरीदते हैं शातिर
-भट्टियों से निकलने वाला धुंआ (जहरीली गैस) लोगों के लिए बना घातक

एमडी खान
आगरा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिस गंदी नाली के बगल से गुजरने में लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वहीं शहर की कुछेक नालियों की सफाई के लिए बोली लगती हैं। नालियों के बाकायदा ठेके उठते हैं। बड़े शहरों में सर्राफा बाजार की ये नालियां सैंकड़ों लोगों के लिए रोजगार का हिस्सा बनी हुई हैं। ताजनगरी के शातिर बड़े शहरों से गंदी मिट्टी खरीदकर लाते हैं और उसमें से सोना-चांदी निकालते हैं। गंदी मिट्टी से सोना निकालने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाली जहरीली गैस लोगों के लिए घातक सिद्ध हो रही है। यह धुंआ टीबी, दमा, श्वांस की बीमारी की वजह बन रहा है। यमुनापार इलाके में आधा दर्जन कारखाने अवैध तरीके से चल रहे हैं। प्रदूषण विभाग के साथ अन्य विभाग भी आंख बंद किये हुए हैं। इन कारखानों से पुलिस को महीनादारी बंधी हुई है। गंदी मिट्टी से निकलने वाला सोना-चांदी पुन: सर्राफा बाजार में पहुंच जाता है। इस धंधे से जुड़े लोगों का कहना है कि यह काम प्रचीन समय से चला आ रहा है। इसे बंद नहीं कर सकते।

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इन शहरों से आ रही गंदी मिट्टी
इस धंधे से जुड़े सतीश ने बताया कि गंदी मिट्टी से सोना-चांदी, कॉपर निकालने की प्रक्रिया बहुत पुरानी है। अधिकांश शहरों में एक समुदाय के लोगों का यह प्रमुख व्यवसाय है। आगरा शहर में भी सैंकड़ों लोग इस धंधे से जुड़े हुए हैं। वह देश के मुबई, दिल्ली, कलकत्ता, चैनई, मद्रास, केरला, इंदौर, भोपाल आदि शहरों से गंदी मिट्टी खरीदकर लाते हैं। दूसरे शहरों से मिट्टी लाने का आसान साधन रेलगाड़ी है। सोना निकालने वाले मिट्टी को देखकर ही बता देते हैं कि इसमें कितना सोना निकल सकता है। इसी के आधार पर मिट्टी को खरीद लाते हैं। क्षेत्रिय लोग मिट्टी को कट्टे में भरकर रखते हैं। पुराने काम करने वाले सिर्फ फोन पर आॅडर देते हैं, तो उधर से ट्रांसपोर्ट के जरिये माल भेजा जाता है। ट्रांसपोर्ट पर कोई पूछताछ नहीं होती। इसकी आड़ में कई शातिर लोग नशे की तस्करी भी करते हैं।

ऐसे नाली में पहुंचता है सोना
स्वर्ण आभूषण की सफाई या नए गहने बनाते वक्त सोने के छोटे-छोटे कण दुकान की फर्श पर गिर जाते हैं। दुकान की सफाई करते वक्त ये पानी के साथ नाली की मिट्टी में दब जाते हैं। दुकान के सफाईकर्मी झाड़ से निकलने वाली मिट्टी नाली में फेंक देते हैं। जहां नाली की ढलान खत्म होती है, वहां ये स्वर्ण कण जाकर जम जाते हैं। कारीगर यहीं से नाली की पूरी गंदगी बोरियों में भर कर अपने ठिकाने ले जाते हैं। नई बस्ती निवासी रहमत ने बताया कि इसके अलावा गंदी से गंदी जगह की मिट्टी को भी खरीदा जाता है। कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहां सोना बनाने या निकालने का काम बढ़ी तादाद में होता है। वहां कारीगर बाथरूम, लेटरिंग भी जाते हैं। उनके पैरों से सोने के कण चिपककर बाथरूम तक पहुंचते हैं।

गटर व श्मसान से भी आती है मिट्टी
सोने की चाह में लोग गटर को खरीद लाते हैं। उससे निकले मलवे को सुखाते हैं। उसे बोरी में भरकर ले आते हैं। सतीश बताते हैं कि कई बार तो हादसे तक हो चुके हैं। गटर सालों तक बंद रहते हैं। इसकी वजह उसमें जहीरीली गैस बन जाती है। गटर खोलते उससे निकलने वाली जहरीली गैंस से कई कारीगर मर चुके हैं। देश के अधिकांश श्मशानघाट नदी नहर के आसपास होते हैं। यहां निकलने वाली राख को भी खरीदा जाता है। सुहागन महिला के मुंह में सोने का टुकड़ा रखा जाता है, या अत्येष्टि के दौरान सोने की वस्तु पहनाने का रिवाज है। उस सोने की चाह में भी श्मसानघाट की राख को खरीदकर लाते हैं।

सोना के साथ निकलती है जहरीली गैस
गंदी मिट्टी में भैंस का गोबर मिलाया जाता है। दस कट्टे मिट्टी में पांच तसले गोबर लगता है। मिट्टी और गोबर के गोले बनाये जाते हैं। इन्हे हल्का सुखा लिया जाता है। गोलों को ब्लोवर गैस की भट्टी में डाला जाता है। कोयले की भट्टी में गोले करीब 12 घंटे तक जलाये जाते हैं। इस प्रक्रिया को अमलगमेशन कहा जाता है। एक बार अमलगम बन जाने के बाद इसे तब तक गर्म किया जाता है, जब तक कि पारा गैस बनकर उड़ नहीं जाता। इसके बाद सोना बचा रह जाता है’ पारे की गैस बहुत ज्यादा जहरीली होती है। 12 घंटे की प्रोसिस के बाद गोले के कांच के टुकड़े बन जाते हैं और जो भी पदार्थ होता है भट्टी के निचले हिस्से में रखे बर्तन में पहुंच जाता है। उसे शीशा बोलते हैं। पहले चरण में मिट्टी से निकलने वाले शीशा को अड्डा (चूना और राख को मिलाकर बनता है) गरम किया जाता है। चूने की विधि से शीशा में से चांदी निकलती है।

सोना-चांदी को अलग करता है तेजाब
दूसरे चरण से निकलने वाली चांदी को एक भगौने में रखते हैं। भगोने में दो लीटर तेजाब डाला जाता है। उसे गरम करने से चांदी गलकर तरल पदार्थ बन जाती है। उस तरल पदार्थ में कॉपर डाल देते हैं। इससे चांदी कॉपर पर बैठ जाती है और सोना ऊपर रह जाता है। तेजाब से गंदगी में सोने-चांदी की मात्र का अनुमान भी लग जाता है और उसके बाद इसमें मरकरी डाली जाती है, जिससे सोना चमकने लगता है। इसके बाद चांदी व सोना को अलग कर लिया जाता है। एक विशेष प्रकार के छन्नीनुमा बर्तन में रख कर उसे पहले सामान्य पानी, फिर चूने के पानी से धोते हैं। इस तरीके से एक कट्टा गंदी मिट्टी से पांच से दस ग्राम सोना निकल आता है। बीस साल पहले एक कट्टे में 20 ग्राम सोना निकल आता था।

पड़ोसियों की जान जोखिम में डाल रहे शातिर
टेड़ी बगिया रोडवेज बस डिपो के पीछे मुन्नालाल नाम का व्यक्ति कारखाना चलाता है। उसी के पास पप्पू और उसकी पत्नी सोना निकालने का काम करते हैं। बेलनगंज महालक्ष्मी टॉकीज के पास बुंदा और रफीक नाम के दो व्यक्ति कारखाना संचालित किये हुए हैं। शाहदरा में बजरंग पेट्रोलपंप के पीछे राधेश्याम काम करता है। शाहगंज नमक की मंडी में भी यह काम किये शातिर चोरी-छिपे कर रहे हैं। यहां आसपास रहने वाले अधिकांश लोग टीबी, श्वांस और कैंसर के पीड़ित हैं।

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