अंबेडकर नगर की पुलिसिंग व्यवस्था इन दिनों एक अजीब विडंबना का उदाहरण बनती जा रही है। कागज़ों पर अनुशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी कहती दिखाई देती है।

कुछ थानों की कमान ऐसे हाथों में है, जिनकी कार्यशैली अक्सर चर्चा का विषय बनती रहती है। हाल ही में क्षेत्राधिकारी भीटी के अंतर्गत आने वाले एक थानाध्यक्ष का नाम किन्नर समाज के क्षेत्र बंटवारे जैसे प्रकरण में उछला। मामला बढ़ा, आवाज़ें उठीं, तब जाकर पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप से स्थिति संभली। सवाल यह है कि क्या व्यवस्था अब “शिकायत आने पर” ही सक्रिय होगी?
विडंबना देखिए—जो अधिकारी स्वच्छ छवि के माने जाते हैं, वे अक्सर पुलिस लाइन की शोभा बढ़ाते नज़र आते हैं, और जिन पर सवाल उठते हैं, वे महत्वपूर्ण थानों की जिम्मेदारी संभालते दिखते हैं। शायद यह नई प्रशासनिक नीति है- “योग्यता प्रतीक्षा में, विवाद प्रभार में।”
जिले के कुछ थानों में दलाल संस्कृति के पनपने की चर्चाएँ भी आम हैं। छोटे-बड़े विवादों के समाधान का अनौपचारिक “रेट कार्ड” यदि सच है, तो यह कानून की किताबों पर एक व्यंग्य मात्र है। जनता थाने को न्याय का दरवाज़ा मानकर जाती है, लेकिन यदि वहाँ दरवाज़े पर ही सौदेबाज़ी की फुसफुसाहट हो, तो भरोसे का क्या होगा?
कटाक्ष यही है- व्यवस्था शायद सब जानती है, सब देखती है, पर बोलती कम है। और जब व्यवस्था मौन हो, तो सवाल और तेज़ हो जाते हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या केवल घटनाएँ शांत होंगी, या व्यवस्था भी स्वयं को दुरुस्त करेगी? क्योंकि वर्दी की असली चमक कार्रवाई से आती है, मौन से नहीं
