सिकंदरा पुलिस पर आरोपों की फेहरिस्त लंबी, जीडी में हेराफेरी का आरोप; चार पुलिसकर्मियों पर दर्ज हो चुका है मुकदमा
आगरा। थाना सिकंदरा पुलिस पर पुलिस अभिरक्षा में मारपीट के आरोपों के बाद न्यायालय के आदेश पर तीन उपनिरीक्षकों और एक आरक्षी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। हालांकि, इस प्रकरण में थाना पुलिस लगातार सवालों के घेरे में बनी हुई है। पीड़िता के अधिवक्ता ने शुक्रवार को दीवानी स्थित बार हॉल में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान थाना प्रभारी द्वारा जीडी (जनरल डायरी) में हेराफेरी कर उच्च अधिकारियों और न्यायालय को गुमराह करने का आरोप लगाया।
अधिवक्ता अजीत सिंह ने बताया कि रुनकता-किरावली मोड़ निवासी सीमा सिकरवार को थाना शाहगंज में दर्ज मारपीट और बलवा के एक मामले में वारंटी होने के कारण थाना सिकंदरा की रुनकता चौकी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। पांच जून को न्यायालय में पेशी के दौरान सीमा ने पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाया। न्यायालय के आदेश पर गठित मेडिकल पैनल द्वारा कराई गई चिकित्सीय जांच में पुलिस द्वारा कराई गई मेडिकल रिपोर्ट और पैनल की रिपोर्ट में अंतर पाया गया। पैनल की जांच में तीन अतिरिक्त चोटें दर्ज की गईं।मामले की सुनवाई के बाद न्यायालय ने छह जून को उपनिरीक्षक सुरजीत, तत्कालीन चौकी प्रभारी रुनकता नीलेश शर्मा, महिला उपनिरीक्षक नेहा तथा आरक्षी सीमा के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए थे। इसके बाद पुलिस ने अपने बचाव में रिवीजन याचिका दायर की, जिसे गुरुवार को न्यायालय ने खारिज कर दिया और मुकदमा दर्ज करने के आदेश को बरकरार रखा।शुक्रवार को आयोजित प्रेस वार्ता में अधिवक्ता अजीत सिंह ने आरोप लगाया कि थाना प्रभारी सिकंदरा लगातार न्यायालय और उच्च अधिकारियों को गुमराह करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित महिला को पुलिस ने लगभग दोपहर एक बजे गिरफ्तार किया था, जिसका सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है। इसके बावजूद जीडी में गिरफ्तारी का समय शाम पांच बजे दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि रुनकता से थाना सिकंदरा पहुंचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है, ऐसे में जीडी में दर्ज समय पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए जीडी में हेराफेरी की गई और न्यायालय व वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करने का प्रयास किया गया। उन्होंने पूरे प्रकरण की पुलिस के बजाय न्यायिक जांच कराए जाने की मांग की। साथ ही कहा कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वे इस मामले में उच्च न्यायालय की शरण लेंगे।
