सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध मामलों में संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल को लेकर एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में जजों को ‘प्रोसिक्यूट्रिक्स’, ‘बेबस महिला’ और ‘लज्जा भंग’ जैसे शब्दों से बचने की सलाह दी गई है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। अदालत ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में दिए जाने वाले न्यायिक फैसलों की भाषा सम्मानजनक, निष्पक्ष और संवेदनशील होनी चाहिए।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अदालतों को ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों से बचना चाहिए जो पीड़ित की गरिमा को प्रभावित करें या सामाजिक पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दें। इसके बजाय आधुनिक, तटस्थ और अधिकार-आधारित शब्दावली अपनाने की सिफारिश की गई है।
किन शब्दों से बचने की सलाह?
कमेटी ने कहा कि न्यायिक आदेशों और फैसलों में निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए—
- प्रोसिक्यूट्रिक्स (Prosecutrix)
- बेबस महिला
- पवित्रता खो दी
- लज्जा भंग
- इज्जत लुटना जैसी पारंपरिक अभिव्यक्तियां
रिपोर्ट के अनुसार, ये शब्द कई बार पीड़ित की पहचान को रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं से जोड़ते हैं और न्यायिक निष्पक्षता की भावना को प्रभावित कर सकते हैं।
इन शब्दों के इस्तेमाल की सिफारिश
कमेटी ने सुझाव दिया है कि अदालतें निम्नलिखित तटस्थ और सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करें—
- Victim (पीड़ित)
- Survivor (सर्वाइवर)
- Complainant (शिकायतकर्ता)
- Bodily Autonomy (शरीर पर अपना अधिकार)
- Sexual Assault (यौन हमला)
रिपोर्ट के अनुसार, ये शब्द पीड़ित की गरिमा, अधिकार और कानूनी स्थिति को अधिक स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से प्रस्तुत करते हैं।
पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था पर जोर
रिपोर्ट में कहा गया है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि अदालतों की भाषा भी ऐसी होनी चाहिए जो पीड़ित के सम्मान और संवेदनाओं का ध्यान रखे।
कमेटी ने माना कि न्यायिक फैसलों में प्रयुक्त शब्द समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। इसलिए अदालतों की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो लैंगिक समानता, मानव गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करे।
जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में बनी थी कमेटी
यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने तैयार की है। समिति का उद्देश्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक शब्दावली की समीक्षा करना और ऐसी भाषा सुझाना था जो आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और पीड़ितों के अधिकारों के अनुरूप हो।
न्यायिक भाषा में बदलाव क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा केवल कानूनी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में अपराध, पीड़ित और महिलाओं के प्रति सोच को भी प्रभावित करती है। इसलिए न्यायिक शब्दावली में बदलाव से न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, समावेशी और पीड़ित-केंद्रित बनाने में मदद मिल सकती है।
क्या होगा इस रिपोर्ट का असर?
यदि रिपोर्ट की सिफारिशों को व्यापक रूप से अपनाया जाता है, तो भविष्य में यौन अपराधों से जुड़े मामलों के फैसलों में अधिक सम्मानजनक और अधिकार-आधारित भाषा देखने को मिल सकती है। इससे पीड़ितों के प्रति संवेदनशील न्यायिक वातावरण विकसित होने की उम्मीद है।
