दिल्ली-NCR में दिवाली पर ग्रीन पटाखों को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, 7 और 8 नवंबर को तय समय में ही चला सकेंगे आतिशबाजी। दिवाली के त्योहार पर दिल्ली-एनसीआर के लोगों को सीमित रूप से आतिशबाजी करने की अनुमति मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण और त्योहार के उत्साह के बीच संतुलन बनाते हुए 7 नवंबर को छोटी दिवाली और 8 नवंबर को दिवाली के दिन प्रमाणित ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की इजाजत दी है। हालांकि, अदालत ने इसके लिए सख्त समयसीमा, बिक्री के नियम और सुरक्षा संबंधी शर्तें भी तय की हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जा सकती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों पर क्या फैसला दिया?
- 7 और 8 नवंबर को कितने बजे चला सकेंगे पटाखे?
- अस्पताल और स्कूलों के आसपास पटाखे चलाने पर रोक
- ग्रीन पटाखों की बिक्री के लिए क्या नियम बनाए गए?
- ग्रीन पटाखे क्या होते हैं और कैसे बनते हैं?
- पारंपरिक पटाखे कैसे फैलाते हैं प्रदूषण?
- पारंपरिक और ग्रीन पटाखों में क्या अंतर है?
- नियम तोड़ने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?
- दिवाली पर उत्सव के साथ प्रदूषण से बचाव भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों पर क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के दौरान प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की अनुमति दी है। अदालत का उद्देश्य लोगों को त्योहार मनाने का अवसर देने के साथ-साथ वायु प्रदूषण को नियंत्रित रखना है।
यह छूट केवल निर्धारित तारीखों और समय के लिए है। तय अवधि समाप्त होने के बाद पटाखे चलाने पर फिर से प्रतिबंध लागू रहेगा। इसके अलावा, पारंपरिक पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी गई है।
7 और 8 नवंबर को कितने बजे चला सकेंगे पटाखे?
सुप्रीम कोर्ट ने छोटी दिवाली और दिवाली के दिन पटाखे चलाने के लिए दो समय निर्धारित किए हैं।
- सुबह: 6 बजे से 7 बजे तक।
- रात: 8 बजे से 10 बजे तक।
यह समयसीमा 7 नवंबर और 8 नवंबर, दोनों दिनों पर लागू होगी। निर्धारित समय के अलावा पटाखे चलाने की अनुमति नहीं होगी।
अस्पताल और स्कूलों के आसपास पटाखे चलाने पर रोक
अदालत ने संवेदनशील स्थानों पर पटाखों के इस्तेमाल को लेकर भी सख्त निर्देश दिए हैं। अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक और जिला स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शैक्षिक संस्थानों तथा अधिसूचित साइलेंस जोन के 300 मीटर के दायरे में पटाखे चलाने पर पूरी तरह रोक रहेगी।
प्रशासन को इन क्षेत्रों की पहचान कर जमीन पर चिह्नित करने और सार्वजनिक रूप से इन्हें ‘नो-क्रैकर जोन’ घोषित करने के निर्देश दिए गए हैं।
ग्रीन पटाखों की बिक्री के लिए क्या नियम बनाए गए?
ग्रीन पटाखों की बिक्री केवल लाइसेंस प्राप्त कारोबारियों और जिला प्रशासन की ओर से निर्धारित स्थानों या बाजारों में ही की जा सकेगी। इसके अलावा कई अन्य शर्तें भी लागू रहेंगी।
- पटाखों की ऑनलाइन बिक्री और डिलीवरी पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।
- ई-कॉमर्स वेबसाइट या प्लेटफॉर्म से पटाखे खरीदना कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा।
- दिल्ली-एनसीआर के बाहर से पटाखे खरीदकर लाने पर रोक रहेगी।
- उपभोक्ताओं को अपने जिले और प्रशासन की ओर से निर्धारित बिक्री की तारीखों और स्वीकृत उत्पादों के नियमों का पालन करना होगा।
- निर्माता और व्यापारियों को प्रशासन के पास अनिवार्य रूप से वित्तीय सुरक्षा राशि जमा करनी होगी।
अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने पर संबंधित कारोबारी की सुरक्षा राशि जब्त की जा सकती है। वहीं, किसी निर्माता के ग्रीन पटाखे नकली पाए जाने या निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने पर उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
ग्रीन पटाखे क्या होते हैं और कैसे बनते हैं?
ग्रीन पटाखे ऐसे पटाखे होते हैं, जिन्हें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इनके निर्माण में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) की ओर से विकसित तकनीकों और निर्धारित फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल किया जाता है।
इनमें कुछ हानिकारक रसायनों और भारी धातुओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता या उन्हें निर्धारित मानकों के अनुसार नियंत्रित किया जाता है। निर्माण के दौरान उत्सर्जन कम करने वाले विशेष एडिटिव्स का भी इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि, ग्रीन पटाखों का मतलब प्रदूषण-मुक्त पटाखे नहीं है। इनके इस्तेमाल से भी धुआं और प्रदूषण हो सकता है, लेकिन प्रमाणित उत्पादों से पारंपरिक पटाखों के मुकाबले उत्सर्जन कम रखने का प्रयास किया जाता है।
पारंपरिक पटाखे कैसे फैलाते हैं प्रदूषण?
पारंपरिक पटाखों के निर्माण में अलग-अलग रासायनिक मिश्रण और कच्चे माल का इस्तेमाल होता है। जलने के बाद इनसे धुआं, राख और सूक्ष्म कण निकलते हैं, जिनमें PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक शामिल होते हैं।
इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थों में पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर और एल्युमिनियम शामिल हो सकते हैं। कुछ पारंपरिक पटाखों में बेरियम, सीसा, आर्सेनिक और पारा जैसी भारी धातुओं का भी इस्तेमाल किया जाता है।
पटाखे जलने पर सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें भी निकल सकती हैं। इनसे हवा की गुणवत्ता खराब होती है और सांस संबंधी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है।
पारंपरिक और ग्रीन पटाखों में क्या अंतर है?

ग्रीन पटाखों को पारंपरिक पटाखों के मुकाबले कम उत्सर्जन वाला विकल्प बनाने के लिए उनके रासायनिक फॉर्मूलेशन और निर्माण प्रक्रिया में बदलाव किए जाते हैं।
दोनों के बीच प्रमुख अंतर इस प्रकार हैं:
- राख और कच्चा माल: ग्रीन पटाखों में कम कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है और इनके निर्माण में राख का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
- हानिकारक धातुएं: प्रमाणित ग्रीन पटाखों के स्वीकृत फॉर्मूलेशन में बेरियम, सीसा, आर्सेनिक और पारा जैसी जहरीली भारी धातुओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
- धुआं और उत्सर्जन: ग्रीन पटाखों को कम धुआं और कम प्रदूषक कण छोड़ने के उद्देश्य से तैयार किया जाता है।
- शोर: पारंपरिक पटाखों की तुलना में ग्रीन पटाखों से कम शोर पैदा होने की अपेक्षा होती है।
- रासायनिक एडिटिव्स: उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड जैसे विशेष एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जा सकता है।
निर्माण तकनीक के अनुसार कुछ ग्रीन पटाखों में पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन पारंपरिक पटाखों की तुलना में करीब 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। हालांकि, वास्तविक उत्सर्जन उत्पाद के प्रकार और उसके प्रमाणित फॉर्मूलेशन पर निर्भर करता है।
नियम तोड़ने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन और नियामक एजेंसियों की होगी।
नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं और विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। इसमें सुरक्षा राशि जब्त करना और नकली या मानकों के विपरीत ग्रीन पटाखे बनाने वाले निर्माता का लाइसेंस रद्द करना शामिल है।
वहीं, उपभोक्ताओं को भी निर्धारित समय, स्थान और स्वीकृत पटाखों से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। प्रतिबंधित स्थानों पर या तय समय के बाहर पटाखे चलाने पर संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई हो सकती है।
दिवाली पर उत्सव के साथ प्रदूषण से बचाव भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के दौरान सीमित आतिशबाजी की अनुमति देता है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण वाला विकल्प हो सकते हैं, लेकिन वे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं।
ऐसे में लोगों के लिए जरूरी है कि वे केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखे खरीदें, प्रशासन की ओर से निर्धारित बाजारों से ही खरीदारी करें और तय समय व स्थान के नियमों का पालन करें।
