विधानपूर्वक रुद्राक्ष धारण करने से पूर्ण होते हैं सकल मनोरथ

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नई दिल्ली। भोलेनाथ के सबसे प्रिय आभूषणों में चमत्कारी बीज रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से बना है। भगवान शंकर को रुद्राक्ष बहुत प्रिय है। यही कारण है कि भगवान शिव के भक्त हमेशा अपने शरीर में इसे धारण किए रहते हैं। दरअसल, रुद्राक्ष के विभिन्न दानों का संबंध अलग-अलग देवी-देवताओं और मनोकामनाओं से है। जैसे एक मुखी रुद्राक्ष तो साक्षात शिव का स्वरूप है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करता है।

वहीं दो मुख वाला रुद्राक्ष देव देवेश्वर कहा गया है। यह सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है। तीन मुखी रुद्राक्ष सदा से समस्त विद्याएं प्राप्त होती हैं। चार मुखी वाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्मा जी का स्वरूप है। इस रुद्राक्ष के दर्शन मात्र से ही धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। पांच मुखी रुद्राक्ष कालाग्नि रूद्र का स्वरूप है। सभी प्रकार का सामथ्र्य प्रदान करने वाला यह रुद्राक्ष मोक्ष दिलाने के लिए जाना जाता है।

छ: मुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय का स्वरूप है। इसे धारण करने व्यक्ति ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है। चमत्कारिक सात मुखी रुद्राक्ष भिखारी को भी राजा बना देता है। भैरव का स्वरूप माना जाने वाला आठ मुखी रुद्राक्ष मनुष्य को पूर्णायु प्रदान करता है। नौ मुखी रुद्राक्ष कपिल-मुनि का और दस मुखी रुद्राक्ष भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। ग्यारह मुखी रुद्राक्ष रुद्ररूप है इसे धारण करने व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती है। रुद्राक्ष को कभी भी काले धागे में धारण न करें। लाल, पीला या सफेद धागे में ही धारण करें।

रुद्राक्ष को चांदी, सोना या तांबे में भी धारण किया जा सकता है लेकिन धारण करते समय ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करना न भूलें। रुद्राक्ष को कभी भी अपवित्र होकर धारण न करें। साथ ही कभी भी भूलकर किसी दूसरे व्यक्ति को अपना रुद्राक्ष धारण करने के लिए नहीं दें। भगवान शिव के प्रसाद यानी रुद्राक्ष को हमेशा विषम संख्या में धारण करें। कभी भी 27 दानों से कम की रुद्राक्ष माला न बनवाएं क्योंकि ऐसा करने पर शिवदोष लगता है। १०८ दानों की माला को धारण करने और उसे जप करने से साधक को विशेष कृपा हासिल होती है। रुद्राक्ष पहनने से एकाग्रता तथा स्मरण शक्ति मजबूत होती है।

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