भारत में प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है गंगा दशहरा

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ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी, जो कि गंगा दशहरे के पर्व काल के नाम से जाना जाता है- एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम

वैदिक सूत्रम चेयरमैन एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस वर्ष गंगा दशहरा 1जून 2020, के दिन मनाया जाएगा। स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए। इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है। यदि कोई मनुष्य पवित्र नदी तक नहीं जा पाता तब वह अपने घर के पास की किसी नदी पर स्नान करके गंगा दशहरे का पुण्य प्राप्त कर सकता है।

वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि वैदिक प्राचीन हिन्दू शास्त्रों में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को संवत्सर का मुख कहा गया है, इसलिए इस दिन दान और स्नान का ही अत्यधिक महत्व है। वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी। इसलिए इस दिन गंगाजी या किसी पवित्र नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। इस बार संयोग से गंगा दशहरे के दिन 1 जून 2020 को ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दिन सोमवार और हस्त नक्षत्र का महासंयोग पड़ रहा है। क्योंकि हस्त नक्षत्र का स्वामी चन्द्रमा ग्रह स्वयं हैं, और चन्द्रमा के दिन सोमवार केपड़ने से वह विशेष सिद्धिदायक हो जाता है। 1 जून को दशमी तिथि दोपहर 2 बजकर 59 मिनट तक रहेगी लेकिन हस्त नक्षत्र पूरे दिन व रात्रि तक रहेगा।

गंगा दशहरे का महत्व

वैदिक सूत्रम चेयरमैन एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि भागीरथी की घोर तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी। गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा। इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो भी श्रदालु गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है। स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है। गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जिस किसी भी वस्तु का दान करें उसकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस किसी भी वस्तु से भी पूजन करें उसकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए। ऐसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है।

गंगा दशहरे का फल

वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। इस दिन गंगा स्नान से इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।

गंगा दशहरे के दिन पूजा विधि

वैदिक सूत्रम चेयरमैन एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि गंगा दशहरे के दिन किसी पवित्र नदी या गंगाजी में स्नान किया जाता है। यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब वह अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकता है। गंगाजी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए। गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-

“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम

इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने वाले भागीरथी का नाम लेते हुए उपरोक्त मंत्र से पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल गंगोत्री धाम को भी स्मरण करना चाहिए। गंगाजी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए। जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए।

वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि गंगा दशहरे के दिन यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है, तब वह वस्तु भी यदि दस प्रकार की वस्तुओं का दान करता है तो अधिक फलदायी होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए। दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए। इसके बाद गंगा नदी में स्नान करते हुए दस बार डुबकी लगानी चाहिए।

गंगाजी की पौराणिक कथा

वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि गंगा दशहरे के दिन सुबह स्नान, दान तथा पूजन के उपरांत कथा भी सुनी जाती है, जो इस प्रकार है।

पंडित प्रमोद गौतम ने गंगा दशहरा की पौराणिक कथाओं के संदर्भ में बताते हुए कहा कि प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर थे। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। एक बार सगर महाराज ने अश्वमेघ यज्ञ करने की सोची और अश्वमेघ यज्ञ के घोडे को छोड़ दिया। राजा इन्द्र यह यज्ञ असफल करना चाहते थे और उन्होंने अश्वमेघ का घोड़ा महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम में पहुंचे और घोड़े को देखते ही चोर-चोर चिल्लाने लगे। इससे महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई और जैसे ही उन्होंने अपने नेत्र खोले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा वे सभी जलकर भस्म हो गये थे।

राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और फिर महाराज दिलीप तीनों ने मृतात्माओं की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि वह गंगा को धरती पर ला सकें किन्तु सफल नहीं हो पाए और अपने प्राण त्याग दिए। उस समय गंगा को पृथ्वी पर इसलिए लाना आवश्यक पड़ रहा था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी नहीं बची थी। इसके बाद महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ हुए उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की और एक दिन ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और भागीरथ को वर मांगने के लिए कहा तब भागीरथ ने गंगाजी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही जिससे वह अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति कर सकें, ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा को तुम्हारे साथ भेज तो दूंगा लेकिन उसके अति तीव्र वेग को कौन सहन करेगा? इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की शरण लेनी चाहिए वही तुम्हारी मदद करेगें। अब भागीरथ भगवान शिव की तपस्या एक टांग पर खड़े होकर करते हैं। भगवान शिव भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं और गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड देते हैं। इस प्रकार से गंगा के पानी से भागीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल होते हैं।

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