इस लेख में हम आपको बताएंगे कि नागा और अघोरी साधु के बीच का क्या अंतर है, और क्यों दोनों ही धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए भी अलग-अलग साधना पद्धतियों का पालन करते हैं।
नागा साधु: धर्म के रक्षक और शास्त्रों के ज्ञाता
नागा साधु मुख्य रूप से सनातन धर्म के रक्षक माने जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य धर्म की रक्षा करना और शास्त्रों के ज्ञान में निपुणता हासिल करना है। “नागा” शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के “नाग” से हुई है, जिसका अर्थ “पहाड़” होता है। नागा साधु कठिन तपस्या करते हुए अपनी शक्ति और शारीरिक क्षमता को बढ़ाते हैं। ये साधु अक्सर अखाड़ों से जुड़े होते हैं और समाज की सेवा में सक्रिय रहते हैं।
नागा साधु अपने शरीर पर विशेष भभूत (हवन की भस्म) लगाते हैं, जो एक लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार होती है। हवन कुंड में पीपल, बेलपत्र, गऊ के गोबर आदि का भस्म करके यह भभूत बनाई जाती है। यह साधु अपने तपस्वी जीवन में संयमित आहार लेते हैं और समाज के लिए धर्म का प्रचार करते हैं।
अघोरी साधु: श्मशान में तपस्या और मृत्यु के रहस्यों का अनावरण
अघोरी साधु भगवान शिव के बेहद कट्टर भक्त होते हैं। अघोरी शब्द का अर्थ “उजाले की ओर” होता है, लेकिन इनकी साधना पद्धति में भय और रहस्य का एक अलग पहलू है। अघोरी साधु श्मशान भूमि में रहते हैं, जहाँ वे जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने की कोशिश करते हैं। इन साधुओं के पास एक मानव खोपड़ी होती है, जो उनकी भक्ति और तपस्विता का प्रतीक मानी जाती है।
अघोरी साधु अपने शरीर पर श्मशान की राख लगाते हैं और अपनी साधना में गहरे रूप से समाहित रहते हैं। वे समाज से दूर रहते हुए, एक साधारण जीवन जीते हैं और केवल भगवान शिव की पूजा करते हैं। इनके तप का उद्देश्य मृत्यु के बाद की अवस्था को समझना और आत्मा की शुद्धि प्राप्त करना होता है। अघोरी साधु एकतरफ श्मशान की राख में लिपटे रहते हैं, तो दूसरी तरफ समाज की पारंपरिक नैतिकताओं और मूल्यों से बाहर रहते हैं।
हालांकि नागा और अघोरी साधु दोनों शिव के उपासक होते हैं, उनके साधना और तपस्या के तरीके अलग होते हैं। नागा साधु समाज में सक्रिय रहते हुए धर्म की रक्षा करते हैं, जबकि अघोरी साधु समाज से दूर रहते हुए मृत्यु और जीवन के गहरे रहस्यों में डूबे रहते हैं। दोनों ही साधु अपने उद्देश्य में सत्य की खोज में लगे होते हैं, लेकिन उनके मार्ग और साधना की पद्धतियाँ बिल्कुल अलग होती हैं।
इन दोनों साधुओं की रहस्यमयी और अद्भुत साधना पद्धतियाँ न केवल धर्म से जुड़ी होती हैं, बल्कि समाज के बाहर की सोच को चुनौती देती हैं।