40 अंक वाला भी बन सकेगा विशेषज्ञ डॉक्टर
(पवन शर्मा एडवोकेट)
आगरा । इसे मजबूरी कहें या जानबूझकर सेहत से खिलवाड़, देश में अब 40 अंक लाने वाले अभ्यर्थी को भी विशेषज्ञ डॉक्टर बनने का मौका दिया जा रहा है । इस व्यवस्था के बाद देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट= पीजी=एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंस (एन बी ई एम एस), नई दिल्ली की ओर से दिनांक 13 .1.26 को जारी नोटिस ने पूरे मेडिकल एजुकेशन सिस्टम की पोल खोल दी है पीजी मेडिकल सीटे खाली ना रहे रहे इसलिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के संचालकों के दबाव में केंद्र सरकार के निर्देश पर बोर्ड को कट ऑफ इतने नीचे लाना पड़ा है कि अब मैरिट नहीं मजबूरी के आधार पर विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने की तस्वीर सामने आ रही है।
भारत की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गंभीर मोड पर खड़ी है । यह वह क्षेत्र है जहां निर्णयों का सीधा संबंध मानव जीवन से होता है लेकिन दुर्भाग्यवश हाल के वर्षों में यहां योग्यता नहीं बल्कि प्रशासनिक मजबूरियां और आर्थिक हित प्राथमिकता बनते जा रहे हैं। नीत पीजी 2025 के लिए नेशनल बोर्ड एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंस द्वारा घोषित नई कट ऑफ ने चिकित्सा जगत और शिक्षाविदों को गहरी चिंता में डाल दिया है। यह फैसला न केवल शैक्षणिक मानकों के पतन का संकेत है ,बल्कि देश के मानव चिकित्सा स्वास्थ्य केभविष्य के साथ किया जा रहे एक खतरनाक प्रयोग की ओर भी इशारा करता है।
नीट पीजी जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का उद्देश्य योग्य और सक्षम विशेषज्ञ डॉक्टरों का चयन करना है।लेकिन जब 800 अंकों की परीक्षा में सामान्य वर्ग के लिए कटऑफ 50 परसेंटाइल से घटाकर 7 परसेंटाइल और आरक्षित वर्ग के लिए 40 परसेंटाइल से सीधे शून्य कर दिया जाए, तो चयन प्रक्रिया अपनी प्रासंगिकता ही खो देती हैं। इसका अर्थ यह है कि नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाला अभ्यर्थी भी अब विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की दौड़ में शामिल हो सकता है। यह स्तिथि चिकित्सा जैसे जीवन- रक्षक पेशे के लिए अत्यंत चिंताजनक है। इस निर्णय के पीछे तर्क दिया जारा है कि सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में पीजी सीटे खाली न रहें। यह सच है कि सीटों खाली रहना संस्थानों के लिए आर्थिक और ढांचागत नुकसान का कारण बनता है,लेकिन क्या इस नुकसान की भरपाई मरीजों की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता से समझौता करके की जानी चाहिए? चिकित्सा ऐसा क्षेत्र है जहां एक छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। यदि प्रवेश स्तर पर ही योग्यता से समझौता किया जाएगा, तो भविष्य में इन डॉक्टरों की विशेषज्ञता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसका असर केवल इलाज की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डॉक्टर और मरीज के बीच के भरोसे को गहरी चोट पहुंचेगी। जब मरीज को वह पता चलेगा कि उसका इलाज करने वाला विशेषज्ञ बेहद कमजोर अकादमिक आधार पर चयनित हुआ है, तो विश्वास का वह रिश्ता कमजोर पड़ जाएगा, जो चिकित्सा व्यवस्था की नींव है। इससे समाज में असुरक्षा और भय का माहौल पैदा होना तय है।
देश के विभिन्न मेडिकल विशेषज्ञों का माना है कि कटऑफ को इस हद तक गिराना भविष्य में मरीजों की सुरक्षा के साथ सीधा खिलवाड़ है। पीजी डॉक्टर ही आगे चल कर सर्जन, फिजिशियन और सुपर स्पेशलिस्ट बनते है।यदि प्रवेश का स्तर ही कमजोर होगा , तो इलाज की गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है असल समस्या सीटों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी संरचना और लागत है। पिछले कुछ वर्षों में पीजी सीटों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, विशेषकर निजी मेडिकल कॉलेजों में इसके बावजूद हर वर्ष 10 से 15 प्रतिशत सीटे, खासकर प्री – क्लिनिकल और पैरा – क्लिनिकल विषयों में खाली रह जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण इन सीटों की अत्यधिक फीस है, जो 20 लाख से लेकर 90 लाख रुपए प्रति वर्ष तक पहुंच चुकी है। इसे में कई योग्य व मेधावी छात्र केवल आर्थिक कारणों से इन सीटों को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते है । कटऑफ गिराना इस समस्या का समाधान नहीं है। सरकार और नियामक संस्थाओं को चाहिए कि वह निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस की संरचना पर तर्कसंगत और पारदर्शी नियंत्रण व्यवस्था लागू करें। साथ ही ग्रामीण व दुरस्त क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए बेहतर वेतनमान, आकर्षक प्रोत्साहन राशि और स्पष्ट प्रशासनिक स्थानांतरण नीति में सुधार किया जाए केवल अनिवार्य सेवा की शर्ते थोपना पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा का मूल सिद्धांत योग्यता एवं प्रतिस्पर्धा होना चाहिए खासकर चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में। नीट पीजी 2025 का यह नया मानदंड न केवल योग्य और मेधावी छात्रों के साथ अन्याय है, बल्कि देश के स्वास्थ तंत्र के लिए भी एक चेतावनी है। सरकार सीटों की संख्या के बजाए मानव हित में सक्षमता और गुणवत्ता को प्राथमिकता दे।
