चौंकाने वाली UN रिपोर्ट! अब पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार, पत्नियों की मार झेलने में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर। जानें समाज की बदलती हकीकत और पुरुषों पर हो रही हिंसा का अनदेखा सच।
नई दिल्ली: घरेलू हिंसा की बात आते ही, अक्सर यह धारणा बनती है कि इसकी शिकार केवल महिलाएँ होती हैं और पुरुष ही हिंसा के दोषी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ने इस पारंपरिक सोच को कड़ी चुनौती दी है। यह रिपोर्ट चौंकाने वाले खुलासे करती है कि दुनिया के कई देशों में महिलाएँ भी घरेलू हिंसा की आरोपी हैं और इसके शिकार पुरुष, खासकर पति, बन रहे हैं। सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि इस सूची में भारत तीसरे नंबर पर है, जहाँ पत्नियों द्वारा पतियों पर की जाने वाली हिंसा के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
पतियों पर हिंसा: मिस्र, यूके के बाद भारत का नंबर
संयुक्त राष्ट्र के अपराध आँकड़ों के अनुसार, पतियों को सबसे ज़्यादा घरेलू हिंसा का शिकार मिस्र में होना पड़ता है। वहाँ की फैमिली कोर्ट के आँकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा के शिकार 66 प्रतिशत पति तलाक के लिए अर्जी देते हैं। इस दुखद सूची में यूनाइटेड किंगडम दूसरे और भारत तीसरे स्थान पर है। भारत जैसे पारंपरिक और पुरुष-प्रधान समाज में यह आँकड़ा वाकई चौंकाने वाला है, जहाँ पुरुषों को अक्सर मज़बूत और भावहीन समझा जाता है। लेकिन हकीकत यही है कि कई पुरुष अपने घरों में चुपचाप अत्याचार सहते हैं, सामाजिक शर्मिंदगी और उपहास के डर से अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं करते।
हिंसा का कोई लिंग नहीं: पुरुष भी होते हैं शिकार
आम धारणा है कि घरेलू हिंसा का अर्थ केवल पति द्वारा पत्नी पर हाथ उठाना है। लेकिन इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंसा का कोई लिंग नहीं होता। यह किसी के भी द्वारा और किसी के भी खिलाफ हो सकती है। महिलाएँ भी कई बार क्रोध, नियंत्रण की चाह या अत्यधिक तनाव में अपने पतियों के साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा करती हैं। समाज में इस संवेदनशील विषय पर खुलकर बात न होने के कारण यह मुद्दा लंबे समय तक अनदेखा रहा है, जिससे पीड़ित पुरुषों को न तो पहचान मिल पाती है और न ही आवश्यक सहायता।
UN गुडविल एंबेसडर का बयान: लैंगिक समानता का सही अर्थ
UN गुडविल एंबेसडर एमा वॉटसन ने भी अपने एक सशक्त भाषण में इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने कहा था कि “अगर हम सच में जेंडर इक्वालिटी (लैंगिक समानता) की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि हिंसा किसी एक लिंग की समस्या नहीं है। महिला सशक्तिकरण का मतलब पुरुषों को कमज़ोर दिखाना नहीं, बल्कि सभी को समान अधिकार और सुरक्षा देना है।” उनके शब्दों में, घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक पुरुषों के खिलाफ हो रही हिंसा को भी उतनी ही गंभीरता से न लिया जाए जितनी महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को।
नज़रिया बदलने का समय आ गया है
यह रिपोर्ट समाज के सामने एक आईना है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं और उन्हें भी सहायता, सहानुभूति और न्याय की उतनी ही ज़रूरत है जितनी महिलाओं को। भारत जैसे देश में, जहाँ पुरुषों से बचपन से ही मज़बूत बने रहने और अपने दर्द को छिपाने की उम्मीद की जाती है, वहाँ उनके दर्द को सुनना और समझना बेहद ज़रूरी हो गया है। समाज को अब लैंगिक समानता के दोनों पहलुओं को एक समान तराजू में तौलने का वक्त आ गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, घरेलू हिंसा का शिकार न हो और सभी को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिले।
