आगरा । 15 फ़रवरी 2026 आध्यात्मिक और शैक्षणिक ऊर्जा के केंद्र दयालबाग में रविवार एक अद्भुत नजारा देखने को मिला। परम पूज्य गुरुमहाराज सत्संगी साहब एवं आदरणीया रानी साहिबा की पावन उपस्थिति में, खेतों की पवित्र कर्मभूमि पर कृषि कार्य के बीच नर्सरी एंड प्ले सेंटर, स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस एवं स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर का संयुक्त वार्षिकोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
सर्वांगीण विकास की आधारशिला: दयालबाग की अद्वितीय शिक्षा प्रणाली
कार्यक्रम के दौरान दयालबाग की उन ऐतिहासिक संस्थाओं की झलक देखने को मिली जो दशकों से बच्चों के चरित्र निर्माण में जुटी हैं:

नर्सरी एंड प्ले सेंटर (स्थापना 1941): यहाँ 3 से 5 वर्ष के नन्हे बच्चों को खेलकूद और शारीरिक व्यायाम के माध्यम से जीवन के शुरुआती संस्कार दिए जाते हैं।

स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस (स्थापना 1965): यहाँ तमिल, तेलुगू, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ फ्रेंच और जर्मन जैसी वैश्विक भाषाओं का भी ज्ञान दिया जाता है।

स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर (स्थापना 1979): यह संस्थान बच्चों को संगीत, नृत्य, ड्रामा और आर्ट एंड क्राफ्ट के जरिए भारतीय संस्कृति से जोड़ता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
वार्षिकोत्सव में नन्हे सितारों ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया:
नर्सरी के बच्चों ने अपनी मधुर आवाज में इंग्लिश सॉन्ग “ओ ग्रेशियस लॉर्ड यू आर सो काइंड” गाकर प्रभु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस के विद्यार्थियों ने उड़िया भाषा में ‘आसो रे आसो कोरिबा चाषो’ (आओ खेती करें) ऐक्शन सॉन्ग के जरिए श्रम की महत्ता बताई।
स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर के बच्चों ने ‘सारी सृष्टि जिससे जागी, बीज वही दिव्य वाणी’ पर भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत कर उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का समापन हृदयस्पर्शी प्रस्तुति ‘तमन्ना’ के साथ हुआ।
शिक्षकों के विचार: संस्कारों से सरोकार
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विभागों के प्रभारियों ने अपने अनुभव साझा किए:

श्रीमती प्रीतम प्यारी (कार्यवाहक प्रभारी, आर्ट स्कूल): उन्होंने बताया कि 15 मिनट की इस प्रस्तुति के लिए एक महीने की कड़ी मेहनत की गई थी, जिसे पूर्णतः ‘परमपिता’ को समर्पित किया गया।
श्रीमती स्वरूप रानी (डी.ई.आई. स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस): उन्होंने जोर दिया कि आठ भाषाओं का ज्ञान बच्चों को भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर ले जाने में मदद करेगा।
श्रीमती महाराज कुमारी एवं श्रीमती मधु बनी: संगीत और नृत्य के माध्यम से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के साथ-साथ सभ्यता को जीवित रखने के प्रयासों पर चर्चा की।
श्रीमती स्वामी प्यारी (प्रभारी, नर्सरी): अपने 48 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि प्राकृतिक वातावरण में बच्चे किस प्रकार उत्साहपूर्वक अपनी कला निखारते हैं।


