(कोमल सोलंकी)
मथुरा। देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह के दिन दीपदान का अत्यंत विशेष महत्व बताया गया है। यह दिन भगवान श्रीहरि के योगनिद्रा से जागरण का प्रतीक है और तुलसी विवाह के साथ यह धर्म, विवाह, संपन्नता और सौभाग्य की शुरुआत का दिन माना गया है। देवउठनी एकादशी के दिन जब सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु चार महीने की गहरी नींद से जागते हैं। जब स्वयं भगवान जगेंगे, तो धरती पर शुभता और ऊर्जा का कितना बड़ा संचार होगा। यही वजह है कि इस एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं और इसी दिन से शादियों समेत सभी मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। इस महा पर्व का सबसे खास और खूबसूरत हिस्सा है दीप दान। दीये जलाना न सिर्फ उत्सव का प्रतीक है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और दुख पर सुख की विजय का भी सूचक है।

ब्रह्मांड घाट पर 1100 दीपों का दान किया गया। दीपों की रोशनी से ब्रह्मांड घाट झिलमिला उठा। इस दौरान महावन उप जिलाधिकारी कंचन गुप्ता, महावन तहसीलदार अमित त्रिपाठी, मुख्य अतिथि चंद्र प्रकाश शर्मा, चंद्रशेखर पांडेय, राजू पंडित पुजारी, शिव सिंह पहलवान,सुभाष पहलवान, अरुण फौजी, चंद्रभान, हरिमोहन, सोनू, अवतार, आकाश जाट, कोमल सोलंकी आदि मौजूद रहे। वैसे तो दीये जलाने के लिए कोई खास नियम नहीं है, लेकिन हमारी सदियों पुरानी परंपराओं में कुछ संख्याएं बेहद शुभ मानी गई हैं। दरअसल, देवउठनी एकादशी के दिन ही माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी से हुआ था। इसलिए, तुलसी माता के पास दीपक जलाना सबसे ज्यादा जरूरी और कल्याणकारी माना जाता है।
