झांसी के मौजा झांसी खास खसरा 1370 में करोड़ों की सरकारी जमीन पर फर्जी रजिस्ट्रियों का खुलासा। नगर निगम ने 28 भू-माफियाओं पर दर्ज कराई FIR। जानें कैसे ठगी गई भोली जनता।
झांसी, उत्तर प्रदेश, सुल्तान आब्दी। उत्तर प्रदेश के झांसी में ‘ताजनगरी’ की तर्ज पर बस रहे आवासीय क्षेत्रों में भू-माफियाओं ने एक ऐसे बड़े खेल को अंजाम दिया है, जिसने सैकड़ों परिवारों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। मौजा झांसी खास के आराजी संख्या (खसरा) 1370 में सरकारी जमीन को निजी बताकर बेचने और फर्जी रजिस्ट्रियां करने के मामले में नगर निगम की तहरीर पर शहर कोतवाली पुलिस ने 28 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
क्या है खसरा 1370 का पूरा मामला?
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, खसरा संख्या 1370 का कुल क्षेत्रफल 20.95 एकड़ है। यह जमीन ‘मिनजुमला’ (संयुक्त) श्रेणी की है, जिसमें से 3.882 हेक्टेयर (लगभग 9.5 एकड़) जमीन राज्य सरकार की है और इसका प्रबंधन नगर निगम झांसी के पास है।
आरोप है कि भू-माफियाओं ने सरकारी और निजी हिस्सों के बीच स्पष्ट विभाजन न होने का फायदा उठाया। कागजों में हेरफेर कर सरकारी जमीन को निजी संपत्ति के रूप में पेश किया गया और धड़ल्ले से प्लॉट काटकर बेच दिए गए।
कोर्ट का ‘स्टे’ और कानून की धज्जियां
इस मामले का सबसे गंभीर पक्ष यह है कि यह जमीन पहले से ही सिविल कोर्ट (वाद संख्या 593/2020) में विवादित है। कोर्ट ने 09 मार्च 2021 को इस भूमि पर “यथास्थिति” (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद, दबंगों ने न केवल जमीन बेची, बल्कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए रजिस्ट्रियां भी जारी रखीं। नगर निगम द्वारा कराए गए भौतिक सत्यापन में यह पुष्टि हुई है कि मार्च 2021 के बाद दर्जनों अवैध बैनामे किए गए।
गरीबों की मेहनत की कमाई पर डाका
यह मामला सिर्फ कानूनी दांव-पेच का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है। ठगी का शिकार होने वाले अधिकांश लोग निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं।
मेहनत की पूंजी: कई मजदूरों और छोटे दुकानदारों ने अपनी जिंदगी भर की बचत और कर्ज लेकर यहाँ प्लॉट खरीदे।
सपनों का घर: लोगों ने इस उम्मीद में घर बनाना शुरू किया कि उनके पास अपनी छत होगी, लेकिन अब उन्हें पता चल रहा है कि उनकी रजिस्ट्री ‘फर्जी’ हो सकती है और जमीन ‘सरकारी’ है।
मानसिक प्रताड़ना: पीड़ितों में भारी आक्रोश और डर है। सवाल यह है कि आखिर इनका पैसा कौन लौटाएगा और क्या इनका घर सुरक्षित रहेगा?
मिलीभगत के बिना असंभव था इतना बड़ा खेल!
स्थानीय निवासियों और पीड़ितों का सीधा आरोप है कि राजस्व विभाग और नगर निगम के निचले स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा फर्जीवाड़ा संभव नहीं है।
रजिस्ट्री कैसे हुई? जब जमीन सरकारी थी और कोर्ट का स्टे था, तो निबंधन विभाग (Registry Office) ने बैनामे कैसे स्वीकार किए?
नगर निगम की चुप्पी: निर्माण के समय निगम के अधिकारी क्यों सोते रहे?
हाउस नंबर का आवंटन: चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी जमीन पर बने अवैध मकानों को नगर निगम ने ‘हाउस नंबर’ तक आवंटित कर दिए, जिससे जालसाजों को जनता को ठगने में आसानी हुई।
पुलिस की कार्रवाई और आगामी जांच
नगर निगम के लेखपाल राजीव राजपूत की तहरीर पर पुलिस ने धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468, 471 (दस्तावेजों में हेरफेर) और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। एसपी सिटी और क्षेत्राधिकारी (CO) ने आश्वासन दिया है कि दस्तावेजों की गहनता से जांच की जा रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
