जैथरा,एटा। वरासत में नाम दर्ज कराने के नाम पर पेटीएम के माध्यम से रिश्वत लेने के मामले में प्रथम दृष्टया दोषी होने पर लेखपाल को एसडीएम अलीगंज ने निलंबित कर दिया है। सोशल मीडिया पर सौदेबाजी का वीडियो और भुगतान के स्क्रीनशॉट वायरल होने के बाद हुई इस कार्रवाई से राजस्व महकमे में हड़कंप मच गया।
जैथरा विकासखंड क्षेत्र के गांव सिराउ निवासी बृजेश ने अपनी मां उमा देवी की मृत्यु के बाद वरासत में नाम दर्ज कराने के लिए 21 नवंबर 2025 को ऑनलाइन आवेदन किया था। आरोप है कि लेखपाल ने बिना रिश्वत लिए वरासत की कार्रवाई आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और लगातार टालमटोल करता रहा। पीड़ित पक्ष का कहना है कि छह खातों की वरासत के लिए कुल 12 हजार रुपये की मांग की गई थी। प्रति खाता दो हजार रुपये की दर तय की गई, जिसमें से अधिकतर रकम राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार के नाम पर बताई गई, जबकि कुछ हिस्सा लेखपाल ने अपने लिए मांगा।
बताया गया कि तय रकम कस्बा जैथरा में श्री गांधी सार्वजनिक इंटर कॉलेज के सामने स्थित शिव जन सेवा केंद्र के पेटीएम खाते में डलवाई गई। वायरल वीडियो में लेखपाल और पीड़ित परिवार के सदस्यों के बीच खुलेआम पैसों को लेकर बातचीत होती दिखी। पहली बार में 10 हजार रुपये और दूसरी बार 1500 रुपये का ऑनलाइन भुगतान कराया गया। इसके बावजूद लेखपाल संतुष्ट नहीं हुआ और 500 रुपये की अतिरिक्त मांग भी की गई।
मामला सोशल मीडिया पर वायरल होते ही प्रशासन हरकत में आ गया। एसडीएम अलीगंज जगमोहन गुप्ता ने जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए जाने पर लेखपाल रोहित चौधरी को निलंबित कर दिया। साथ ही पूरे मामले की जांच तहसीलदार को सौंप दी गई है। एसडीएम का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
इस कार्रवाई को प्रदेश की योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति का परिणाम माना जा रहा है। डिजिटल माध्यम से रिश्वत लेने का मामला सामने आने पर त्वरित कदम उठाए जाने से साफ संदेश गया है कि भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
केंद्र संचालक पर कार्रवाई न होना बना चर्चा का विषय
जिस जन सेवा केंद्र के पेटीएम खाते में रिश्वत की रकम डलवाई गई, उस केंद्र के संचालक पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जबकि स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह जन सेवा केंद्र क्षेत्र के लेखपालों के बैठने और राजस्व से जुड़े मामलों की सौदेबाजी का प्रमुख ठिकाना बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, ऐसे मामलों में केंद्र संचालक की भूमिका भी संदेह के घेरे में रहती है, इसके बावजूद कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े कर रहा है। प्रशासन की आगे की जांच में इस पहलू पर क्या रुख अपनाया जाता है, इसे लेकर लोगों की निगाहें टिकी हैं।
