झाँसी, उत्तर प्रदेश, सुल्तान आब्दी, झाँसी। जनपद में बीते कुछ वर्षों के दौरान जमीन के कारोबार ने जिस रफ्तार से करवट ली है, उसने कई चौंकाने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं। जो लोग कभी जमीन के कारोबार में नए माने जाते थे, वे आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक बनकर बैठे हैं। कम समय में इतनी अकूत संपत्ति आखिर कहां से और कैसे जुटाई गई, यह अब शहर में चर्चा का बड़ा विषय बन चुका है।
स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि कुछ लोगों ने सरकारी जमीनों को ही बेच डाला, तो कुछ ने अनपढ़ और असहाय ग्रामीणों की जमीनों पर कब्जा कर प्लाटिंग कर दी। कई मामलों में विश्वासघात कर जमीनों के सौदे किए गए और बाद में वही जमीन कई गुना दामों में बेची गई। जमीन के इस तेजी से बढ़ते खेल ने न केवल ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीर बदली है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

रक्सा, बबीना, टाकोरी, गढ़मऊ, रामगढ़, दुर्गापुर, सिजवाहा, बल्लमपुर और बिजौली जैसे क्षेत्रों में पुनर्वास के लिए चिन्हित जमीनों पर बड़े पैमाने पर प्लाटिंग किए जाने की चर्चाएं हैं। आरोप है कि पुनर्वास की भूमि, जो जरूरतमंदों और विस्थापितों के लिए सुरक्षित मानी जाती है, उसे भी निजी लाभ के लिए काटकर बेचा गया। पूर्व सत्ताधारी दल के बड़े-बड़े पदाधिकारियों ने भी सत्ता के बल पर असहायों के लिए आवंटित पुनर्वास की जमीन पर अपनी हनक के दम कब्जा कर बेचने से गुरेज नहीं किया। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल कानूनी उल्लंघन है बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
कई आरटीआई एक्टिविस्टों ने इस विषय पर गंभीर अध्ययन कर दस्तावेजों के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाने का दावा किया है। उनका कहना है कि राजस्व अभिलेखों, भूमि उपयोग की स्थिति और स्वामित्व परिवर्तन की प्रक्रिया में कई विसंगतियां दिखाई देती हैं। यदि प्रशासन सख्ती से जांच करे और पुराने रिकार्ड खंगाले जाएं तो बड़े खुलासे संभव हैं।
झांसी में बीडा प्रोजेक्ट के आने के बाद जमीनों की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आया। इस उछाल का फायदा किन लोगों ने उठाया और किन परिस्थितियों में भूमि हस्तांतरण हुए, यह भी जांच का विषय बन सकता है। शहर में चर्चा है कि कुछ लोगों के “वारे न्यारे” इसी दौर में हुए और साधारण कारोबारी अचानक बड़े भू-स्वामी बन बैठे।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और व्यापक जांच करेगा? क्या पुनर्वास भूमि, सरकारी जमीन और कमजोर वर्गों की संपत्तियों से जुड़े सौदों की पड़ताल होगी? यदि सख्ती से जांच हुई तो झांसी में जमीन के खेल का असली चेहरा सामने आ सकता है। फिलहाल शहर में यही चर्चा है कि जमीन के इस खेल में कौन खिलाड़ी है और किसे संरक्षण प्राप्त है। अगले समाचार में इस विषय पर मौजा और आराजी संख्या व अन्य भूलेखों के साथ विस्तार से प्रकाशन किया जायेगा जिससे कई बड़े नाम बेनकाब होकर सामने आयेंगे।
