आगरा: शहर के चौराहों पर यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है, और इसका बड़ा कारण पार्किंग ठेकेदारों और यातायात पुलिस की कथित मिलीभभगत बताई जा रही है। शहर की सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रहे ‘लाल घोड़े’ (लाल रंग के टेम्पो) और सफेद नंबर प्लेट वाली इको गाड़ियाँ यात्रियों को बेधड़क ढो रही हैं, जिससे सरकार को मिलने वाले राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है। आरोप है कि यह ‘जुगलबंदी’ ऐसी है कि कार्रवाई करने की बजाय आँखों पर पट्टी बाँध ली जाती है, जिसका सीधा फायदा संबंधित लोगों की जेब में पहुँच रहा है। ठेकेदार के गुर्गों द्वारा पूरे दिन अवैध वसूली का खेल जारी है।
ठेका एक, वसूली अनेक

आगरा नगर निगम द्वारा शहर में पार्किंग के ठेके दिए गए हैं। नियमों के मुताबिक, एक बार पर्ची कटने के बाद वाहन से किसी अन्य चौराहे पर दोबारा पार्किंग शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन, नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, ठेकेदार और उनके गुर्गे हर चौराहे पर आने वाली गाड़ियों से दोबारा वसूली कर रहे हैं। कई चौराहों पर तो बिना पर्ची काटे ही वाहनों पर केवल नंबर डालकर लोगों को चूना लगाया जा रहा है।
अवैध रूप से चल रहे लाल टेम्पो और इको गाड़ियाँ

परिवहन निगम के नियमों के अनुसार, केवल पीले रंग की नंबर प्लेट वाले व्यावसायिक वाहनों को ही यात्री ढोने की अनुमति होती है। लेकिन, ठेकेदार और यातायात पुलिस की मिलीभगत से सफेद रंग की नंबर प्लेट वाली इको गाड़ियाँ और लाल रंग के टेम्पो नगर निगम सीमा के अंदर धड़ल्ले से यात्रियों को ढो रहे हैं। यही नहीं, कई लाल रंग के टेम्पो तो हरे रंग में पुतवाकर भी शहर में सवारियाँ ढो रहे हैं, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।
टीआई और ट्रैक्टर चालकों की पुरानी ‘दोस्ती’

शहर में तैनात ट्रैफिक इंस्पेक्टरों और ट्रैक्टर चालकों के बीच की ‘दोस्ती’ भी काफी पुरानी बताई जाती है। यमुनापार क्षेत्र में ट्रैफिक इंस्पेक्टर और ट्रैक्टर चालकों की सांठगांठ की अलग ही मिसाल देखने को मिलती है। सीमेंट गोदाम से निकलने वाले ट्रक हों या ट्रैक्टर, या फिर अवैध ईंट मंडी में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर, सभी पर यातायात पुलिस पूरी तरह मेहरबान रहती है। आरोप है कि ‘समय’ और ‘लक्ष्मी प्रसाद’ (अवैध वसूली) के आते ही कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले इन ट्रैक्टरों को निजी उपयोग में लिया जाता है।
गुर्गों के लिए नीली टी-शर्ट का नहीं हुआ उपयोग

ट्रैफिक पुलिस द्वारा कुछ समय पहले ठेकेदारों के गुर्गों की पहचान के लिए नीले रंग की टी-शर्ट वितरित की गई थीं। प्रत्येक चौराहे पर 4-4 टी-शर्ट बाँटी गई थीं, ताकि उनकी पहचान सुनिश्चित हो सके। लेकिन, इस पहल का कोई खास असर नहीं दिखा, क्योंकि ये टी-शर्ट अभी तक उपयोग में आती हुई नहीं देखी गई हैं। यह भी इस पूरे खेल में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।
