डीएम के औचक निरीक्षण में मिलीं कमियों पर हुआ था निलंबन, जांच में आरोप ही नहीं टिके; बीएसए के बार-बार एक ही जवाब से उठे सवाल
अग्र भारत संवाददाता ,आगरा। जनपद के जिलाधिकारी के औचक निरीक्षण में पीएमश्री विद्यालय रोहता की व्यवस्थाओं में कमियां मिलने के बाद हुई कार्रवाई को विभागीय जांच ने महज दो माह में ही दूसरी दिशा दे दी। तीन जुलाई को जिलाधिकारी के निरीक्षण के बाद प्रभारी प्रधानाध्यापिका को निलंबित किया गया। विभागीय जांच में डीएम के निरीक्षण में आरोप और निर्देश प्रमाणित नहीं पाए गए और 10 सितंबर को उन्हें चेतावनी देकर सवेतन बहाल कर दिया गया। इतना ही नहीं, बहाली के बाद उन्हें दोबारा उसी विद्यालय में प्रधानाध्यापक प्रभारी की जिम्मेदारी दे दी गई है।
बीएसए का चौंकाने वाला जवाब—’चलो दिखवाता हूं’, मामले में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से जब सीधे पूछा गया कि तीन जुलाई को जिलाधिकारी के निरीक्षण के दौरान दर्ज की गई कमियां और दिए गए निर्देश सही हैं या फिर बाद में खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा की गई जांच रिपोर्ट सही है? यदि डीएम के निरीक्षण में सामने आई कमियों के आधार पर निलंबन हुआ था और बाद की जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए तो प्रधानाध्यापिका को उसी विद्यालय में दोबारा जिम्मेदारी देने का आधार क्या रहा?इन सवालों पर बीएसए का बार-बार एक ही जवाब सामने आया—“चलो, दिखवाता हूं।” लेकिन सवाल यह है कि आखिर किस रिपोर्ट को सही माना गया और किस आधार पर जिलाधिकारी के निरीक्षण में दर्ज कमियों को विभागीय जांच में प्रमाणित नहीं माना गया, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया।
डीएम के निरीक्षण में दर्ज हुई थीं कमियां, तीन जुलाई को जिलाधिकारी ने पीएमश्री विद्यालय रोहता का निरीक्षण किया था। निलंबन आदेश में निरीक्षण के दौरान रसोईघर में राशन उपलब्ध नहीं होने, मध्यान्ह भोजन व्यवस्था में लापरवाही, स्मार्ट टीवी का प्रयोग नहीं होने, नियमित कंप्यूटर कक्षा संचालित नहीं होने तथा कंपोजिट ग्रांट से संबंधित कार्यों में अनियमितता समेत कई बिंदु दर्ज किए गए थे। विद्यालय में 235 विद्यार्थी नामांकित होने के बावजूद निरीक्षण के समय 108 विद्यार्थी उपस्थित मिले थे। निरीक्षण के आधार पर प्रधानाध्यापिका के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई की गई और प्रकरण की जांच खंड शिक्षा अधिकारी एत्मादपुर महेंद्र सिंह को सौंपी गई।
जांच ने बदल दिया कार्रवाई का रुख,विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार जांच अधिकारी ने एक सितंबर को जांच आख्या प्रस्तुत की। इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने आरोपों को प्रमाणित नहीं माना और 10 सितंबर को प्रधानाध्यापिका को चेतावनी देकर सवेतन बहाल कर दिया।यहीं पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। जिस निरीक्षण के आधार पर निलंबन की कार्रवाई हुई, उसी प्रकरण में विभागीय जांच ने आरोपों को प्रमाणित नहीं माना। सवाल यह है कि जांच के दौरान ऐसा कौन सा नया तथ्य या साक्ष्य सामने आया, जिससे निरीक्षण में दर्ज कमियां ही आरोप के रूप में टिक नहीं पाईं?
डीएम के निर्देश सही या बीईओ की जांच?मामले में अब सबसे सीधा सवाल यही है कि तीन जुलाई के डीएम के निरीक्षण में दर्ज कमियां सही थीं या एक सितंबर को बीईओ की जांच में उन्हें गलत माना जाना सही है? अगर डीएम के निरीक्षण में कमियां सही थीं तो कार्रवाई चेतावनी तक क्यों सीमित कर दी गई? और यदि विभागीय जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए तो निलंबन की प्रारंभिक कार्रवाई का आधार क्या था?इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए तो प्रधानाध्यापिका को उसी विद्यालय में दोबारा प्रभारी प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी देने से पहले विद्यालय की व्यवस्थाओं का पुनः सत्यापन कराया गया या नहीं?
उसी विद्यालय में फिर जिम्मेदारी,बहाली के बाद प्रधानाध्यापिका को किसी अन्य विद्यालय में तैनाती देने के बजाय उसी पीएमश्री विद्यालय रोहता में दोबारा प्रधानाध्यापक प्रभारी बना दिया गया। ऐसे में विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि निलंबन के समय जिन कमियों को गंभीर मानते हुए कार्रवाई की गई थी, उनके संबंध में अब विभाग का निष्कर्ष क्या है और डीएम के निरीक्षण में दर्ज बिंदुओं का वर्तमान स्थिति से क्या संबंध है।मामले में बीएसए से पूछे गए सीधे सवालों पर बार-बार “चलो दिखवाता हूं” जवाब सामने आना भी विभागीय कार्रवाई और दोनों रिपोर्टों के बीच स्पष्टता को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
