आगरा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना को लेकर एक बार फिर सियासत और अधिवक्ताओं का आंदोलन तेज होने के संकेत मिले हैं। जस्टिस जसवंत सिंह आयोग की रिपोर्ट के बाद मेरठ के कुछ अधिवक्ताओं द्वारा उसके विरोध में किए जा रहे आंदोलन को आगरा के अधिवक्ताओं ने अनुचित बताया है। उनका कहना है कि आयोग ने स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट बेंच के लिए केवल आगरा को ही उपयुक्त माना है और मेरठ सहित अन्य जिलों की मांगों को खारिज किया जा चुका है।
अधिवक्ताओं का कहना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण पिछले पांच दशकों से आगरा में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना लंबित है। इससे आगरा सहित पूरे मंडल के अधिवक्ताओं में निराशा और आक्रोश व्याप्त है। आगरा को केंद्रीय विधि राज्यमंत्री का प्रतिनिधित्व मिलने के बावजूद कोई ठोस परिणाम न निकलना भी असंतोष का बड़ा कारण है।
वरिष्ठ अधिवक्ता हेमन्त भारद्वाज ने बताया कि संघर्ष समिति के बैनर तले आगरा मंडल के सभी जिलों और तहसीलों के अधिवक्ताओं को एकजुट किया जाएगा। नववर्ष की शुरुआत से एक बार फिर व्यापक और प्रभावशाली आंदोलन खड़ा किया जाएगा, ताकि जस्टिस जसवंत सिंह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार केवल आगरा के अधिकार की लड़ाई को जनसमर्थन के साथ आगे बढ़ाया जा सके।
उन्होंने कहा कि पूर्व में आगरा मंडल के व्यापारिक और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर आगरा बंद, चक्का जाम, दिल्ली पैदल मार्च और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जैसे आंदोलन किए जा चुके हैं, लेकिन सरकारों ने इस वैध मांग को नजरअंदाज किया। अब आंदोलन की नई रणनीति इस तरह तय की जाएगी कि सरकार आगरा के अधिकार की अनदेखी न कर सके।
