आगरा। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून के तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं, ताकि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। लेकिन जनपद में इसी प्रावधान के साथ बड़े स्तर पर छेड़छाड़ और सीटों में कटौती के गंभीर आरोप सामने आए हैं। शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों और निजी स्कूल संचालकों की मिलीभगत से कागजों में छात्र संख्या घटाकर गरीब बच्चों का हक मारा जा रहा है। यह शिकायत अभैदोंपुरा किरावली निवासी नरेश चंद शर्मा पुत्र महेश चंद शर्मा द्वारा मुख्य विकास अधिकारी को दी गई है।
कागजों में कम, हकीकत में ज्यादा छात्र,शिकायत के मुताबिक कई निजी स्कूलों में वास्तविक छात्र संख्या 150–200 या उससे अधिक है, लेकिन पोर्टल और रिकॉर्ड में संख्या जानबूझकर कम दर्ज की जा रही है। चूंकि आरटीई सीटें कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत के आधार पर तय होती हैं, इसलिए आंकड़े घटते ही गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटें स्वतः कम हो जाती हैं। नतीजतन पात्र बच्चों को प्रवेश से वंचित रहना पड़ता है।
पोर्टल पर ‘सीट मैनेजमेंट’ का खेल,आरोप है कि यू-डायस (UDISE) और आरटीई पोर्टल पर छात्रों को ‘ड्रॉप’ या अन्य श्रेणियों में दिखाकर कुल संख्या कम कर दी जाती है। इस सुनियोजित ‘सीट मैनेजमेंट’ से हर साल लाखों-करोड़ों रुपये का आर्थिक लाभ उठाया जा रहा है।
नगर क्षेत्र कार्यालय के बाबू पर भी सवाल,शिकायत में नगर क्षेत्र कार्यालय में तैनात एक बाबू की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। बताया गया है कि वह अपने रसूख और विभागीय संरक्षण के बल पर आरटीई मामलों में दखल देता है तथा निजी स्कूल संचालकों से सांठगांठ कर सीटों के इस खेल को अंजाम देता है। सूत्रों के अनुसार विभागीय संरक्षण में करोड़ों रुपये का लाभ उठाया जा रहा है। उसकी पत्नी, जो माध्यमिक शिक्षा विभाग में तैनात है, उसकी नियुक्ति को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
जांच की मांग,शिकायत में स्कूलों की वास्तविक छात्र संख्या का भौतिक सत्यापन, यू-डायस और आरटीई पोर्टल के आंकड़ों का मिलान, पिछले तीन शैक्षणिक वर्षों के रिकॉर्ड की जांच, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग की गई है।
बड़ा सवाल…….आरटीई कानून का उद्देश्य गरीब बच्चों को समान अवसर देना है, लेकिन यदि सीटों में हेरफेर हो रही है तो यह सीधे तौर पर उनके अधिकारों पर डाका है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता से कार्रवाई करता है।
