नाबालिग पर मुकदमे में नियमों की अनदेखी, दरोगा व दो सिपाहियों पर गिर चुकी है गाज,बाल अधिकार उल्लंघन पर तीखे सवाल, मामला बाल आयोग तक पहुंचा
अग्र भारत संवाददाता ,आगरा। शास्त्रीपुरम स्थित डीपीएस में कक्षा 10 के दो छात्रों के बीच हुई मारपीट का मामला अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। नाबालिग से जुड़े इस संवेदनशील प्रकरण में नियमों की अनदेखी कर थाना सिकंदरा में मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद, जहां दरोगा सहित दो सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया, वहीं थाना प्रभारी की जिम्मेदारी होने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई केवल विभागीय जांच तक सीमित रखे जाने पर सवाल उठने लगे हैं। लोगों में थाना प्रभारी के रसूख की भी चर्चा है।
जानकारों का कहना है कि किसी भी थाने में दर्ज होने वाले मुकदमे की अंतिम जिम्मेदारी थाना प्रभारी की होती है। ऐसे में अधीनस्थ पुलिसकर्मियों पर तत्काल कार्रवाई और थाना प्रभारी को केवल विभागीय जांच तक सीमित रखना पुलिस व्यवस्था की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।प्रकरण में नाबालिगों की पहचान उजागर होने और किशोर न्याय अधिनियम के उल्लंघन के आरोप भी सामने आए हैं। आरोप है कि पुलिस ने संवेदनशीलता बरतने के बजाय किशोर न्याय एवं बाल संरक्षण नियमों को दरकिनार कर मुकदमा दर्ज कर लिया, जिसकी प्रति भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इससे बच्चों की गोपनीयता और भविष्य दोनों पर गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ।
इसी मुद्दे को लेकर चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट अधिवक्ता नरेश पारस ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल एक मारपीट की घटना नहीं, बल्कि बाल अधिकारों के संरक्षण में गंभीर चूक का मामला है।बताया गया है कि आगरा कमिश्नरेट में बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों को थानों में बुलाकर प्रतिमाह कार्यशालाएं आयोजित कराई जाती हैं, ताकि पुलिसकर्मियों को किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) की जानकारी दी जा सके। इसके बावजूद सिकंदरा थाना प्रभारी द्वारा अधिनियम के प्रति अनभिज्ञता दर्शाते हुए मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश देना गंभीर लापरवाही माना जा रहा है। ऐसे में पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी थाना प्रभारी पर भी तय किए जाने की मांग उठ रही है।
अधीनस्थों पर सख्ती, प्रभारी पर नरमी क्यों?:मामले में दरोगा और दो सिपाहियों को निलंबित किया जाना त्वरित कार्रवाई मानी जा रही है, लेकिन थाना प्रभारी को केवल विभागीय जांच तक सीमित रखना कई सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जिम्मेदारी शीर्ष स्तर की है, तो कार्रवाई भी उसी स्तर पर होनी चाहिए।
सोशल मीडिया और यूट्यूबर की भूमिका पर विवाद:घटना के बाद पीड़ित छात्र के परिजन द्वारा सोशल मीडिया पर वीडियो साझा किए जाने से मामला और तूल पकड़ गया। नाबालिग की पहचान उजागर करने पर यूट्यूबर की भूमिका को भी संवेदनहीन बताया जा रहा है। इस संबंध में भी कार्रवाई की मांग उठ रही है।
किशोर न्याय बोर्ड के आदेश का इंतजार :पुलिस ने आरोपित छात्र को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। अब आगे की कार्रवाई बोर्ड के आदेश के अनुसार की जाएगी। फिलहाल, पूरा मामला पुलिस की जवाबदेही, बाल अधिकारों की सुरक्षा और कानून के पालन को लेकर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
