आगरा के खेरागढ़ में उटांगन नदी हादसे में 12 युवाओं की मौत के 10 माह बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। पढ़िए राम कृपाल सिंह का विशेष लेख, जिसमें हादसे, प्रशासनिक कार्रवाई और पीड़ित परिवारों की पीड़ा की पड़ताल की गई है।
राम कृपाल सिंह
आगरा. जिले की खेरागढ़ तहसील में लगभग दस माह पहले हुई एक दर्दनाक घटना आज भी लोगों के दिलों में ताजा है। देवी प्रतिमा विसर्जन के दौरान उटांगन नदी में बने एक गहरे गड्ढे में डूबने से एक ही गांव और एक ही समाज के 12 युवाओं की मौत हो गई थी। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि ऐसा हादसा था जिसने पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो दिया।
समय बीत गया, लेकिन आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस हादसे का जिम्मेदार कौन है? और उन परिवारों से किए गए वादों का क्या हुआ, जिन्होंने अपने घर के चिराग खो दिए?
हादसे को भुला देना क्या उचित है?
ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर चर्चा का केंद्र अनुशासन, प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी या युवाओं की जल्दबाजी बन जाती है। लेकिन यदि इन पहलुओं को भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी क्या 12 युवाओं की मौत का महत्व कम हो जाता है? क्या यह हादसा कुछ दिनों की संवेदना के बाद भुला दिया जाना चाहिए?
यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना घटना वाले दिन था।
नेताओं के वादे, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं
घटना के बाद मंत्री, सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता पीड़ित गांव पहुंचे। सभी ने संवेदनाएं व्यक्त कीं और कई घोषणाएं कीं।
किसी ने आर्थिक सहायता का वादा किया, किसी ने सड़क बनाने की बात कही, तो किसी ने विद्यालय निर्माण की घोषणा कर दी। लेकिन दस माह बीत जाने के बाद जब इन घोषणाओं की वास्तविकता जानने का प्रयास किया गया, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दी।
पीड़ित परिवारों की पीड़ा आज भी वैसी ही है
मृतकों के परिजनों से बातचीत के दौरान सबसे मार्मिक मुलाकात यादव सिंह से हुई, जिनके दोनों बेटे इस हादसे में अपनी जान गंवा बैठे।
यादव सिंह और अन्य परिजनों ने बताया कि उन्होंने किसी से कुछ नहीं मांगा, लेकिन नेताओं द्वारा की गई अधिकांश घोषणाएं आज तक पूरी नहीं हुईं।
उनका कहना था कि दुख के समय सभी आए, तस्वीरें खिंचवाईं, आश्वासन दिए और फिर सब कुछ भूल गए।
आखिर क्या हुआ था 20 अक्टूबर 2025 को?
20 अक्टूबर 2025 को नवदुर्गा महोत्सव के अंतिम दिन देवी प्रतिमा विसर्जन की तैयारी चल रही थी। गांव के युवाओं ने निर्णय लिया कि प्रतिमा का विसर्जन खेरागढ़ से गुजरने वाली उटांगन नदी में किया जाएगा।
नदी में सामान्य दिनों में पानी कम रहता था, इसलिए किसी को खतरे का अंदेशा नहीं था।
जब युवक प्रतिमा लेकर नदी पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। प्रशासन पहले से ही निर्देश दे चुका था कि प्रतिमाओं का विसर्जन नदी में नहीं, बल्कि नगर पंचायत द्वारा बनाए गए विसर्जन कुंड में किया जाएगा।
युवाओं ने कुछ देर प्रयास किया, लेकिन पुलिस के सख्त रुख के बाद वे प्रतिमा लेकर लौट गए।
हालांकि, कुछ युवाओं को नदी तक पहुंचने का दूसरा रास्ता मालूम था। वे उसी रास्ते से नदी तक पहुंच गए।
एक गहरे गड्ढे ने छीन ली 12 जिंदगियां
पूरी नदी में पानी घुटनों तक था, लेकिन जिस स्थान पर प्रतिमा विसर्जन किया गया, वहां लगभग 10 फीट से अधिक गहरा गड्ढा था।
युवाओं को इस गहराई की जानकारी नहीं थी।
जैसे ही पहला युवक गड्ढे में उतरा, वह डूबने लगा। उसे बचाने के प्रयास में एक-एक करके अन्य साथी भी पानी में उतरते गए और देखते ही देखते 12 युवाओं की जान चली गई।
यह दृश्य इतना भयावह था कि पूरे क्षेत्र में चीख-पुकार मच गई।
सात दिन तक चला रेस्क्यू ऑपरेशन

घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और गोताखोर मौके पर पहुंचे।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी नदी के तल में जमा खतरनाक गाद।
गोताखोरों के अनुसार पूरी नदी उथली थी, लेकिन केवल उसी स्थान पर गहरा गड्ढा और दलदली गाद थी, जिसमें शव फंस गए थे।
जब सभी आधुनिक प्रयास असफल हो गए, तब स्थानीय स्तर पर कंप्रेसर मंगाकर गाद में हवा छोड़ी गई। इसके बाद सात दिनों तक चले अभियान में एक-एक कर सभी 12 शव बाहर निकाले जा सके।
सबसे बड़ा सवाल – गड्ढा बना कैसे?
आज भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि नदी के बीचोंबीच इतना गहरा गड्ढा आखिर बना कैसे?
स्थानीय लोगों के बीच इसको लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं, लेकिन आधिकारिक स्तर पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
जब संबंधित अधिकारियों से जानकारी ली गई तो बताया गया कि उच्च स्तर पर जांच कराई गई थी और सर्वेक्षण में पूरी नदी सामान्य पाई गई, केवल उसी स्थान पर गहरा गड्ढा था।
लेकिन वह गड्ढा क्यों था, इसका स्पष्ट उत्तर आज भी नहीं मिल सका।
एफआईआर भी दर्ज नहीं हुई
पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें प्रशासन की ओर से भरोसा दिलाया गया था कि सरकार स्वयं पूरे मामले की जांच कराएगी।
जब संबंधित थाने से जानकारी ली गई तो बताया गया कि इस संबंध में कोई शिकायत दर्ज नहीं है।
यही स्थिति कई अन्य सवाल भी खड़े करती है कि यदि जांच हुई, तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं हुए?
अधूरी संवेदनाएं और अधूरे वादे
इस हादसे में जान गंवाने वाले ओमपाल, गगन, हरीश, अभिषेक, ओके, महावीर, कारण, भगवती, गजेंद्र, मनोज, दीपक और वीनेश की उम्र 16 से 27 वर्ष के बीच थी।
ये सभी युवा अपने परिवारों की उम्मीद थे।
दस महीने बाद भी उनके परिजन न्याय, जवाब और किए गए वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।
खेरागढ़ उटांगन नदी हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं था, बल्कि कई सवालों को जन्म देने वाली त्रासदी थी। इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था, सुरक्षा उपायों और राजनीतिक घोषणाओं की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगाया।
पीड़ित परिवारों को शायद अपने खोए हुए बेटे कभी वापस नहीं मिलेंगे, लेकिन यदि निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया और किए गए वादों को पूरा किया जाए, तो उन्हें यह विश्वास अवश्य मिलेगा कि समाज और व्यवस्था उनके साथ खड़ी है।
जब तक इस हादसे के सभी सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक यह घटना केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि न्याय की प्रतीक्षा करती एक जीवंत पीड़ा बनी रहेगी।
