एटा। तहसील प्रशासन को जल्दबाजी अब भारी पड़ सकती है। जैथरा क्षेत्र में 27 दिसंबर 2024 को बुलडोजर चलवाने वाले अफसर अब खुद फंसते नजर आ रहे हैं।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में अपने एक अहम आदेश में साफ कहा था कि किसी भी अवैध निर्माण को तोड़ने या कब्जा हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को कम से कम 15 दिन का नोटिस दिया जाना जरूरी है। इसके बावजूद तहसील प्रशासन ने कॉलेज प्रबंध समिति को सिर्फ तीन दिन का नोटिस थमाया और चौथे दिन ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करा दी।
इस मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की अनदेखी अदालत की अवमानना के दायरे में आती है। ऐसे में कार्रवाई करने वाले अफसरों पर न केवल अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है, अपितु नुकसान की भरपाई भी उनको जेब से करनी पड़ सकती है। तहसील प्रशासन के साथ-साथ नगर पंचायत प्रशासन भी इसमें शामिल है।
सूत्रों के अनुसार, श्री लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज जैथरा की प्रबंध समिति ने प्रशासन की इस कार्रवाई को पूरी तरह अवैध बताया है और वह अब उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी रही है। समिति का आरोप है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर तक नहीं दिया गया। सिर्फ तीन दिन के समय अंतराल में ही पूरी कार्रवाई कर दी गई। जबकि जमीन विवाद का मामला अपर आयुक्त के न्यायालय में विचाराधीन था। आरोप है कि यह कार्रवाई पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर की गई है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि नोटिस अवधि का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका देना है। इसके उल्लंघन पर संबंधित अफसरों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
बताया जा रहा है कि इस प्रकरण में एसडीएस, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और लेखपाल के साथ-साथ नगर पंचायत प्रशासन के जिम्मेदारों तक की भूमिका की जांच की जा सकती है। यदि यह साबित हुआ कि कार्रवाई बिना निर्धारित प्रक्रिया के की गई, तो इन अधिकारियों की गर्दन फंसना तय है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा था कि इन निर्देशों का पालन न करने पर अवमानना और अभियोजन की कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही अधिकारियों को मुआवजे के साथ ध्वस्त संपत्ति को अपनी लागत पर वापस करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा।
स्थानीय स्तर पर भी प्रशासन की इस जल्दबाजी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे, तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों की गई?
अब सबकी निगाहें अदालत की ओर हैं—क्या अफसरों की मनमानी पर कसेगा कानूनी शिकंजा?
पर्दे के पीछे बना रहा शातिर, उलझा दिए अफसर!
नगर पंचायत जैथरा में जमीन के खेल करने वाला मास्टरमाइंड पर्दे के पीछे बना रहा और उसने अफसरों को फंसा दिया। निजस्वार्थवश अफसर उसके मोहपाश में फंसते चले और जमीनों के सौदे उलझते चले गए। यह शातिर मास्टरमाइंड खुद कहीं भी किसी भी पद पर नहीं है, लेकिन पद पर आसीन अफसरों के फंसाने का जाल उसने बुन दिया है। नगर में चर्चा है कि यदि अफसर इसी तरह शातिर द्वारा बताई गईं जमीनों के मामले में लोभवश उलझते रहे, तो किसी दिन अफसरों को बड़ी कार्रवाई से जूझना पड़ सकता है।
