मात्र दो पैसे में कुंभ का इकोनॉमिक्स: मालवीय जी ने अंग्रेज वायसराय को समझाया, मार्क ट्वैन बोले- ‘गोरों के लिए यह समागम कल्पना से परे

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मात्र दो पैसे में कुंभ का इकोनॉमिक्स: मालवीय जी ने अंग्रेज वायसराय को समझाया, मार्क ट्वैन बोले- 'गोरों के लिए यह समागम कल्पना से परे

प्रयागराज/कुंभ मेला 2025 – 1942 में जब अंग्रेज वायसराय लिनलिथगो प्रयागराज के महाकुंभ मेला को देखने पहुंचे, तब उनके साथ थे भारत के महान नेता और शिक्षाविद मदन मोहन मालवीय। कुंभ मेला का दृश्य देखकर वायसराय काफी हैरान हुए और उन्होंने मालवीय जी से सवाल किया, “इतने बड़े आयोजन में कितना धन और श्रम लगता है?” तब मालवीय जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “मात्र दो पैसे!” यह सुनकर वायसराय लिनलिथगो चौंक गए। उन्होंने मालवीय जी से इस रहस्य को जानने के लिए सवाल किया कि आखिर यह कैसे संभव हो सकता है।

मालवीय जी ने तत्काल अपना पंचांग निकाला और वायसराय को दिखाया। उन्होंने कहा, “यह दो पैसे का पंचांग, भारत के कोने-कोने में बिका है। इस पंचांग में हर वर्ष कुंभ की तिथि, स्नान के दिन और उसकी धार्मिक महत्ता का विवरण होता है। इसके द्वारा लाखों श्रद्धालु जान जाते हैं कि कुंभ कब है और वे श्रद्धा के साथ संगम तट की ओर चल पड़ते हैं।”

कुंभ मेला: एक आर्थिक दृष्टिकोण

कुंभ मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। 1882 में महाकुंभ आयोजन में 20,288 रुपये का खर्च आया था, जबकि 2025 के महाकुंभ का बजट 7500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि समय के साथ इस आयोजन की भव्यता और महत्व कितने अधिक बढ़ गए हैं। 1894 में 23 करोड़ की आबादी में से लगभग 10 लाख श्रद्धालुओं ने इस पवित्र स्नान में भाग लिया था, और उस वर्ष के आयोजन पर 69,427 रुपये का खर्च हुआ था।

पश्चिमी विद्वानों का कुंभ पर आकर्षण

कुंभ मेला हमेशा से पश्चिमी दुनिया के विद्वानों और विचारकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। अमेरिकी लेखक और विचारक मार्क ट्वैन ने 1894-95 में प्रयागराज का दौरा किया था और अपने अनुभवों को अपनी किताब “फॉलोइंग द इक्वेटर: ए जर्नी अराउंड द वर्ल्ड” में साझा किया। उन्होंने कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखकर लिखा, “यह अद्भुत है, इस तरह का विश्वास जो बड़ी संख्या में वृद्धों और कमजोरों, युवा और अन्य लोगों को बिना किसी शिकायत के इतनी लंबी यात्रा करने के लिए प्रेरित कर सकता है।”

मार्क ट्वैन ने कुंभ मेले की विशालता और श्रद्धा की शक्ति को देखकर इस आयोजन को “कल्पना से परे” बताया था। उन्होंने कहा, “आस्था वाकई चमत्कार कर सकती है। लोग गंगाजल पीने के लिए उसे न किसी प्यास बुझाने के लिए बल्कि आत्मा और शरीर की शुद्धि के लिए पी रहे थे।”

कुंभ मेला: भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक

कुंभ मेला हिंदू आस्था का सबसे बड़ा उत्सव है, जिसमें भारत की विभिन्न धार्मिक धाराओं का संगम होता है। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” में लिखा था, “यह वास्तव में समग्र भारत था, जो इस विशाल आयोजन में एकत्रित हुआ था।” उनका कहना था कि यह समग्र भारत का प्रतिबिंब है, जहां देश के कोने-कोने से लोग आकर एकजुट होते हैं।

यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी के समय में, 1954 के महाकुंभ में, जब देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हुए थे, यह आयोजन एक ऐतिहासिक घटना बन गया था।

कुंभ मेला: आस्था और श्रद्धा का प्रतीक

मार्क टुली, एक प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक, जिन्होंने भारत में कई वर्षों तक पत्रकारिता की, उन्होंने भी कुंभ मेले की भव्यता का वर्णन किया। उन्होंने कहा, “महाकुंभ जैसी भव्यता और उत्कृष्टता मैंने कहीं और नहीं देखी। यहां कोई उन्माद नहीं है, सिर्फ श्रद्धा की शांत निश्चितता है।” टुली ने भी कुंभ में भाग ले रहे साधुओं और तीर्थयात्रियों की आस्था को सराहा। उन्होंने लिखा, “महाकुंभ का सबसे अभूतपूर्व दृश्य होता है साधुओं को नगाड़ों की ताल पर नाचते हुए नदी में स्नान करने के लिए बढ़ते हुए देखना।”

कबीर के भक्तों से मिलना और हिंदू धर्म की सहिष्णुता

मार्क टुली ने अपनी यात्रा के दौरान कबीर के भक्तों से भी मुलाकात की, जिन्होंने उनके सामने हिंदू धर्म की सहिष्णुता और विविधता का उदाहरण प्रस्तुत किया। वे लिखते हैं, “कबीर के भक्तों ने मुझे बताया कि वे देवताओं की तस्वीरों की भर्त्सना करते हैं, लेकिन किसी ने भी उनकी बातों का विरोध नहीं किया। इसका कारण शायद यह है कि हिंदू धर्म विविधताओं से भरा है।”

कबीर दास के अनुसार, कुंभ मेला मानव शरीर का रूपक है। उन्होंने कहा,

“जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी,
फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी”

इसका अर्थ यह है कि जैसे जल एक घड़े में भरा होता है, वैसे ही मनुष्य की इंद्रियां और अहंकार उसकी मोटी दीवारें होती हैं, जिन्हें तोड़ने पर आत्मा परम तत्व में विलीन हो जाती है।

कुंभ मेला न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की संस्कृति, एकता, और समृद्धि का प्रतीक है। यह एक ऐसा आयोजन है जो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया को आकर्षित करता है। पश्चिमी विद्वानों और पत्रकारों ने इसके बारे में अपने विचारों को साझा किया है, और यह साबित करता है कि कुंभ मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है जो हर व्यक्ति को जीवन के गहरे अर्थ की खोज में प्रेरित करता है।

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Manisha Singh is a freelancer, content writer,Yoga Practitioner, part time working with AgraBharat.
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