Varanasi News: उत्तर प्रदेश की धार्मिक राजधानी वाराणसी में रविवार को उस समय भारी सियासी हंगामा खड़ा हो गया, जब समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसदों और विधायकों के प्रतिनिधिमंडल को पुलिस ने मणिकर्णिका घाट जाने से रोक दिया। सपा सांसद वीरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कार्यकर्ता घाट पर कथित रूप से मूर्तियों के तोड़े जाने की सच्चाई जानने जा रहे थे। पुलिसिया कार्रवाई से नाराज सांसद अपने समर्थकों के साथ अर्दली बाजार स्थित आवास के बाहर धरने पर बैठ गए।
अखिलेश यादव के निर्देश पर ‘सत्य’ की खोज
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर हो रहे निर्माण कार्य और वहां से वायरल हुई विचलित करने वाली तस्वीरों (जिन्हें सरकार AI-जनरेटेड बता रही है) की जांच के लिए 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का गठन किया था। सपा का दावा है कि प्रशासन ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट कर रहा है।
पुलिस और सपाइयों के बीच तीखी नोकझोंक
रविवार सुबह जैसे ही सांसद वीरेंद्र सिंह अपने आवास से निकले, भारी पुलिस बल ने उन्हें रोक लिया।
-
सांसद का आरोप: “प्रशासन ने पहले 11 लोगों को जाने की अनुमति दी थी, लेकिन अब वे सच छिपाने के लिए तानाशाही कर रहे हैं। हमारे कार्यकर्ताओं को घरों में नजरबंद कर दिया गया है।”
-
प्रशासन की घेराबंदी: लहुराबीर, चौक और गोदौलिया जैसे इलाकों में भारी पुलिस बल और पीएसी (PAC) तैनात कर दी गई ताकि कोई भी कार्यकर्ता घाट तक न पहुँच सके।
सांसद वीरेंद्र सिंह ने कहा: “सरकार भ्रम फैला रही है कि वीडियो AI से बने हैं। अगर सब कुछ ठीक है, तो हमें वहां जाने से क्यों रोका जा रहा है? हम सिर्फ सच देखना चाहते हैं।”
मणिकर्णिका घाट विवाद: आखिर मामला क्या है?
मणिकर्णिका घाट के पुनरुद्धार और सौंदर्यीकरण का कार्य चल रहा है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें प्राचीन मूर्तियों और लोकमाता अहिल्याबाई होलकर द्वारा बनवाए गए ढांचों को मलबे में दिखाया गया था।
-
सरकार का पक्ष: जिला प्रशासन और पुलिस का कहना है कि ये तस्वीरें भ्रामक या एआई (AI) द्वारा निर्मित हैं। इस मामले में पुलिस ने 8 लोगों पर एफआईआर (FIR) भी दर्ज की है।
-
विपक्ष का पक्ष: सपा और कांग्रेस का आरोप है कि विकास के नाम पर काशी की पौराणिक विरासत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
प्रशासन की सफाई: सुरक्षा सर्वोपरि
अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (ADCP) नीतू कात्यायन ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया। उन्होंने कहा, “शुरुआत में सीमित लोगों को अनुमति दी गई थी, लेकिन जब राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन का आह्वान किया, तो भीड़ बढ़ने और सुरक्षा बिगड़ने की आशंका के चलते अनुमति वापस लेनी पड़ी।”
वाराणसी में मणिकर्णिका घाट का यह मामला अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। एक तरफ भाजपा सरकार इसे ‘भव्य काशी’ का निर्माण बता रही है, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी इसे ‘विरासत का विनाश’ करार दे रही है। आगामी चुनाव और क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमा सकता है।
