एटा: ये हिर्स-ओ-हवस की मंडी है, अनमोल रतन बिक जाते हैं,महलों के परख़च्चे उड़ते हैं, धनवान के धन बिक जाते हैं, दौलत की तरह तौबा-तौबा, अहबाब-ए-वतन बिक जाते हैं…नज़ीर शोलापुरी के एक मुख़म्मस से ली गईं यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ खाकी को बेचने वालों पर सटीक बैठती हैं। जैथरा में खाकी को बेचने वालों की कलम तो जिंदा है, परन्तु ज़मीर मर गया है। हालात यह हैं कि थाने के सामने सजीं दुकानों पर सौदागर खुलेआम सौदा करते हैं। तहरीर लिखने के समय ही पूरा सौदा हो जाता है। ये खाकी को भी बेचने से नहीं चूकते हैं। अब इन सौदों की कहानी बड़े साहब के कानों तक पहुंच चुकी है।
जैथरा में खाकी को बेचने वालों की कमी नहीं है। कोई संबंधों में बेच रहा है, तो कोई इमोशनल वार कर खाकी की करुणा बटोर रहा है। कोई चाय की चुस्की के साथ खाकी का सौदा कर रहा है, तो कोई सिगरेट के धुएं के साथ खाकी की सौदागरी कर रहा है। खेल भी ऐसा कि खाकी भी समझ न पाए और सौदा भी हो जाए। दरअसल, जैथरा थाने पर अमूमन हर रोज फरियादियों का आना-जाना रहता है। कोर्ट के बाहर सजे वकीलों के चेम्बरों की भांति जैथरा थाने के बाहर भी तहरीर लेखन के नाम पर सौदागरों की दुकानें सजीं हैं। इन दुकानों पर पीड़ितों की दुखती रग पर हाथ रखने के साथ ही पूरा सौदा कर लिया जाता है। पीड़ित को पुलिस से मजबूत संबंध दिखाने के लिए खाकीधारी को बुला लिया जाता है और इशारों-इशारों में ही खाकी को बेच दिया जाता है। अभी हाल ही में खाकी को बेचने के कई मामले जैथरा में चर्चा का विषय बने हुए हैं। एक प्रवासी की पत्नी और बच्चे कहीं चले गए, तो गुमशुदगी लिखाने के नाम पर सौदागरों ने खाकी को बेच दिया। चर्चा है कि उस गरीब से 5 हजार रुपये ऐंठ लिए गए। इससे पहले घटतौली के मामले में भी खाकी को बेच दिया गया। इससे पहले लड़की भगाने के मामले में चाय की चुस्की के साथ 50 हजार में खाकी को बेच दिया गया। आए दिन ऐसे सौदे इन सौदागरों की दुकानों पर हो रहे हैं, परन्तु अफसोस है कि खाकी का हंटर शांत है, जिससे गठजोड़ के आरोप लग रहे हैं। अब इन सौदागरों की कहानी बड़े साहब के कानों तक पहुंची चुकी है।
साहब! यहां तो खाकी को बेच देते हैं सौदागर! खाकी को नहीं मिल रहा ढेला, जैथरा में खूब हो रहा खेला
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