एटा: इन दिनों जनपद एटा के कस्बा जैथरा में बेहतर शिक्षा के नाम पर खुली दुकानें (शिक्षण संस्थान) अभिभावकों के आर्थिक शोषण का केंद्र बन चुके हैं। पाठ्य पुस्तकों के नाम पर इन दुकानों पर खुलेआम लूट हो रही है। बच्चों के भविष्य की चिंता में अभिभावक भी लूट की प्रक्रिया में जाने अनजाने में योगदान दे रहे हैं। सामान्य दर की किताबों को उच्च मूल्य पर बेचा जा रहा है। जबकि शासन के दिशा निर्देशों को कड़ाई से पालन करने की जगह जिम्मेदार अधिकारी औपचारिकताएं पूरी करने में लगे हैं। नए सत्र को शुरू हुए लगभग डेढ़ सप्ताह बीत चुका है। अभी तक जैथरा क्षेत्र के किसी विद्यालय में किताबों के पसरे काले साम्राज्य पर कार्यवाही होती नहीं दिख रही है, जिससे यह स्पष्ट होता दिख रहा है कि चांदी की चमक में आंखों की रोशनी चली गई है। आगामी समय में अगर शिक्षा व्यवस्था का यही हाल रहा तो गरीब वर्ग का बच्चा शिक्षा से वंचित रह जाएगा। धीरे-धीरे शिक्षा पाने का अधिकार सिर्फ पैसे वालों या उच्च घरानों तक सीमित हो जाएगा। फिर कोई गरीब का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या लोकसेवक बन देश की सेवा नहीं कर सकेगा।
विदित हो जिलाधिकारी एटा प्रेम रंजन सिंह ने शासन के दिशा निर्देशों के अनुपालन में एक टीम गठित की थी, किंतु अभी तक नगर में दर्जनों विद्यालय ऐसे हैं जिनमें निजी पाठ्यक्रम की पुस्तक बेखौफ संचालित हो रही हैं । शासनादेश में एनसीईआरटी की पुस्तकों को प्राथमिकता दिए जाने का स्पष्ट उल्लेख है। शासन के निर्देशों का उल्लंघन करने वाली शिक्षण संस्थानों को स्पष्टीकरण के साथ जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है। इसके बाद भी नियमों का पालन नहीं किए जाने पर मान्यता रद्द कर प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की कार्यवाही भी की जा सकती है।
जांच को आंच कहां ?
जैथरा क्षेत्र में निजी पाठ्यक्रम को लेकर जिस प्रकार की शिथिलता बरती जा रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि निजी प्रकाशकों ने कमीशन के भारी भरकम बजट से एक हिस्सा जांच टीम के लिए प्रस्तावित कर दिया है। एक माह में लाखों रुपए का कमीशन कमाने वाले शिक्षण संस्थानों को अब किसी बात की चिंता नहीं है। यदि कोई ऊंच नीच होती है तो दो चार पांच परसेंट कमीशन खर्च कर सब कुछ सेट कर लिया जाएगा। कमीशन के इस खेल ने ही जांच टीम को भी अपना पंगु बना लिया है। प्रशासन ने अभिभावकों को बच्चों के साथ विद्यालयों के प्रपंच में फंसाकर सिसकने के लिए छोड़ दिया है। क्या अब इसी प्रकार शिक्षा के नाम पर खुली इन दुकानों पर लोगों का आर्थिक शोषण होता रहेगा?
