- पुलिस स्मृति दिवस पर सीएम योगी ने किया था भत्ते में बदलाव
- डीए-टीए के नाम पर पुलिसकर्मियों का होता है आर्थिक शोषण
आगरा। ब्रज में कहावत है कि जैसा गुड़ डालोगे, वैसा ही मीठा होगा, जी हां हम बात कर रहे हैं कि थाने-चौकियों में तैनात पुलिसकर्मियों की। जिन्हे आज भी लग्जरी गाड़ी या हाई स्पीड बाइक का पीछा करने के लिए पुलिस के जवान को खर्चें के नाम पर साइकिल भत्ता ही मिल रहा है। जबकि सीएम पुलिस स्मृति दिवस पर एलान किये थे कि साइकिल भत्ते की जगह मोटरसाइकिल भत्ता दिया जाये।
सीएम के आदेश का छह माह बाद भी अधिकारी अनुपालन नहीं करा सके हैं। साइकिल भत्ता लेने के लिए भी कई जगह माथा टेकना पड़ता है। इससे अधिक बुरा हाल दबिश में बाहर जाने वाले पुलिसकर्मियों का है, जिन्हे टीए-डीए लेने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। संबंधित विभाग ही भत्ता और अन्य सुुविधाओं के नाम पर पुलिसकर्मियों का आर्थिक शोषण करता है। ऐसी तमाम सुविधाएं हैं, जिन्हे लेने में आने वाली अड़चनों की वजह से जवान छोड़ देते हैं।
छह माह पहले हुआ था आदेश
पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर अक्टूबर वर्ष 2022 में सीएम योगी आदित्यनाथ ने पुलिसकर्मियों को तोहफा बतौर साइकिल भत्ता 200 रुपये को खत्म कर मोटरसाइकिल भत्ता 500 रुपये देने का एलान किया था। उस आदेश का धरातल पर अभी तक पालन नहीं हो सका है। मिनीस्ट्रियल विभाग में तैनात रह चुके अधिकारी ने बताया कि आदेश तो हुआ है, लेकिन अभी तक शासन से जीओ नहीं आया है।
दबी जुबान से पुलिसकर्मी कहते हैं कि 500 रुपये भत्त्ता मिल जायेगा, तो वह भी उंट के मुंह में जीरा होने के मुताबिक है। इतने से पांच दिन ही बाइक चल सकती है। अन्य दिनों में अपनी जेब से पेट्रोल डलवाना पड़ता है। वहीं यह भत्ता लेने के लिए भी लिपिक शाखा में बिल जमा करने के दौरान वजन रखना पड़ता है। उसके बाद भी फाइल आगे बढ़ती है। यह भत्ता भी उसी को मिलता है। जिसकी ड्यूटी थाने में होती है। इसके अलावा एसओजी, अन्य कोई भी शाखा में तैनाती वाले पुलिसकर्मियों को भत्ता नहीं दिया जाता है। पुलिसकर्मी कहते हैं कि थानों के अतिरिक्त तैनाती वाले पुलिसकर्मी को भत्ता नहीं मिलेगा, हालांकि ऐसा कोई आदेश नहीं हैं। विभाग में तैनात बाबू अपने खुद के आदेश चलाते हैं। कई जवान बोले हमे नहीं पता, भत्ता कैसे मिलता है।
टीए-डीए न मिलने की वजह से पुलिससिंग होती है प्रभावित
यातायात भत्ता और मंहगाई भत्ता (टीए-डीए) पुलिस में समय पर नहीं मिलता है। इसको लेकर भी अमर भारती की दो दर्जन इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर से बात हुई। उनका मत था कि विभाग से टीए-डीए लेना हैं, तो मिनिस्ट्रियल विभाग के सिस्टम में चलना होगा। जो सिस्टम में नहीं आया, तो उसे टीए-डीए का टी भी नहीं मिल सकता।
रेंज ऑफिस में तैनात एक इंस्पेक्टर ने कहा कि चार साल पहले एक अपराधी को पकड़ने के लिए पांच से छह लोग मुंबई गये थे। 15 दिन मुंबई की खाक छानी। सभी ने अपनी जेब में रखे आखिरी नोट तक अपनी दबिश जारी रखी। जब बस का किराया भी नहीं रहा, उसके बावजूद मुजरिम को लेकर आये। 15 दिन का आने-जाने और खाने का खर्चा लेने के लिए बिल जमा किये। चार साल हो गये, बिल आजतक पास नहीं हुए हैं।
वहीं एसटीएफ को एडवांस में टीए-डीए मिलता है। देश के केरल, गोवा, आंध प्रदेश सहित कई राज्यों में भी टीए-डीए एडवांस में मिलने का प्रावधान है।
बिल पास करवाने में कमीशन का खेल
जिले में रहे चुके इंस्पेक्टर से टीए-डीए और मेडीकल क्लेम पर बात की, तो उन्होंने भी अपनी पीड़ा व्यक्त कर दी। उन्होंने बताया कि पत्नी के उपचार में करीब पांच लाख रुपये खर्च हो गये। खानापूर्ति के बाद बिल पास करवाने के लिए संबंधित विभाग में दिया। वहां तैनात बाबू ने स्पष्ट शब्दों में इशारा कर दिया कि दस प्रतिशत मुझे चाहिए और दस प्रतिशत ही स्वास्थ विभाग को जायेगा।
इंस्पेक्टर ने बाबू से कहा कि पचास हजार आपको दूं, और पचास वहां भेजूं, उसके बाद मेरे हाथ में चार लाख रुपये आयेंगे। जबकि मेरे द्वारा दिये बिल वास्तविक खर्चे के हैं। इससे अच्छा तो पूरा पैसा सरकार के पास तो रहेगा। वह बिल आज तक पास नहीं हुआ।
कार खरीदने से पहले लेनी है परमिशन
पुलिसकर्मी को बेटा, पत्नी या खुद के नाम पर एक महीने की सैलरी से एक रुपया अधिक कीमती सामान खरीदने से पहले एसएसपी से परमीशन लेनी होती है। सब इंस्पेक्टर व इंस्पेक्टर को डीआईजी से परमीशन लेनी होती है। परमीशन नहीं मिलने पर गाड़ी, मकान आदि कुछ खरीद नहीं सकते।
दरोगा कहते हैं कि भला हो सुप्रीमकोर्ट का, वर्ष 2010 में एक आदेश जारी कि या कि अगर पुलिसकर्मी ने कोई खरीददारी करने से पहले परमीशन मांगी है और उसे परमीशन नहीं मिली है, तो वह खरीददारी कर सकता है। वर्ष 2014 में एक सब इंस्पेक्टर ने कार खरीदने की परमीशन मांगी थी, जो आज तक नहीं मिली है। बाबू से पूछने पर कह दिया था कि मुख्यालय में भेज दी है। जबकि नियमानुसार उस परमीशन को डीआईजी कर सकते थे। बाबू का मिठाई नहीं दी, तो परमीशन लटक गई। सोचने वाली बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश न होता तो वह आज भी कार नहीं खरीद सकते थे।
इन सुविधाओं का भी मिलता है लाभ
- दो बच्चों के लिए भत्ता मिलता है।
- तीन साल में एक बार वर्दी भत्ता दिया जाता है।
- परिवार के लिए मेडीकल एलाउंस होता है।
- साल में तीस दिन की सीएल और तीस दिन की ईएल मिलती हैं। जिसे लेने के लिए बहुत पापड़ बेलने होते हैं या झूठ का पुलंदा बनाना पड़ता है।
- यूपी में सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक वर्दी भत्ता मिलता है, जबकि अन्य कई राज्यों में एसपी रैंक तक के अधिकारी को भत्ता दिया जाता है।
- जिनके पास सरकारी आवास नहीं है, उनको हाउस रेंट मिलता है। बाबू उसे देने के लिए भी तमाम खानापूरी करवाते हैं।
- बच्चों की हायर एजेकूशन के लिए बिना ब्याज के लोन मिलता है।