नई दिल्ली: देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों—विशेषकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ‘डीपफेक’ (Deepfake) जैसी वारदातों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद सरकार ने संकेत दिए हैं कि संसद के मौजूदा सत्र में एक नया विधेयक (बिल) पेश किया जा सकता है, जिसके तहत इन नए दौर के अपराधों को एक अलग और विशिष्ट श्रेणी के अपराध के रूप में परिभाषित किया जाएगा।
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संसद में नया बिल जल्द: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इन उभरते साइबर अपराधों के लिए कड़े प्रावधान वाला एक नया ड्राफ्ट बिल लाने पर विचार कर रही है।
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सीजेआई सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि मौजूदा आपराधिक कानूनों में इन नए किस्म के अपराधों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है।
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अलग अपराध और संपत्ति जब्ती: कोर्ट ने सुझाव दिया कि डिजिटल अरेस्ट में जबरन वसूली और संगठित अपराध जैसे गंभीर तत्व शामिल हैं, इसलिए इसे स्टैंडअलोन (अलग) अपराध बनाते हुए आरोपियों की संपत्ति जब्त करने जैसे कड़े प्रावधान होने चाहिए।
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एआई डीपफेक पर नकेल: अदालत ने स्पष्ट किया कि डीपफेक तकनीक के जरिए धोखाधड़ी और पहचान छिपाकर लोगों को ठगने के मामलों से निपटने के लिए ठोस विधायी कदम जरूरी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
डिजिटल अरेस्ट के खतरे और इससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि यद्यपि ऐसे मामलों में शामिल अपराधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया है और उन्हें आसानी से जमानत नहीं दी जा रही है, फिर भी देश के मौजूदा कानूनों में इन्हें अलग से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
बेंच ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सवाल किया, “इसमें जबरन वसूली, लूट और संगठित अपराध जैसी बातें शामिल हैं। क्या इसे एक अलग अपराध के तौर पर परिभाषित करने और आरोपी की संपत्ति जब्त करने जैसी सख्त सजा तय करने की जरूरत है?”
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास है। उन्होंने कहा, “अब डीपफेक आ गए हैं, जिनका इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने या धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके हम न तो किसी नए अपराध को परिभाषित कर सकते हैं और न ही नया कानून बना सकते हैं।”
सरकार का पक्ष और आगामी कदम
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इस गंभीर विषय पर पूरी तरह गंभीर है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर विधिक सलाह ली जा चुकी है और संभावना है कि संसद के इस सत्र में इससे जुड़ा नया विधेयक लाया जाएगा, जो डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक दोनों को कवर करेगा।
वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को जानकारी दी कि सरकार द्वारा गठित हाई-लेवल इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी के सहयोगात्मक प्रयासों से हाल ही में डिजिटल अरेस्ट की वारदातों में उल्लेखनीय कमी आई है। पैनल सिस्टम की कमियों को दूर करने के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में जुटा है।
गौरतलब है कि खासकर बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को निशाना बनाकर उनकी जीवनभर की पूंजी लूटने वाले इन डिजिटल फ्रॉड के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी थी। नए कानून के आने से इन संगठित साइबर अपराधियों पर कानूनी शिकंजा और अधिक मजबूत होने की उम्मीद है।
