UP Politics News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में रोजाना बदलते समीकरण और बयानबाजी सियासी पारा हाई रखे हुए हैं। ‘यूपी Tak’ के विशेष न्यूज शो ‘आज का यूपी’ में आज हम राज्य की तीन सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक खबरों का गहराई से विश्लेषण कर रहे हैं। आइए जानते हैं इन तीनों बड़ी खबरों का पूरा लेखा-जोखा और सियासी नफा-नुकसान:
- 1. ऊंचाहार सीट पर बेटे के लिए नरम पड़े स्वामी प्रसाद मौर्य, याद दिलाया अखिलेश का ‘पुराना वादा’
- यूपी में GST डिप्टी कमिश्नर अनुपमा सरोज का VRS मंजूर, क्या सिधौली से लड़ेंगी चुनाव?
- 2. INDIA गठबंधन में स्वामी प्रसाद मौर्य की राहें आसान नहीं, ओवैसी-चंद्रशेखर से जुड़ने की अटकलें
- गाजियाबाद के वसुंधरा पुलिस चौकी के अंदर जोरदार धमाका: कांच के शीशे टूटे, डिलीवरी बॉय घायल; एक संगठन ने ली जिम्मेदारी का दावा
- 3. सपा-कांग्रेस के बीच रणनीतिक खींचतान और यूपी का बदलता राजनीतिक परिदृश्य
1. ऊंचाहार सीट पर बेटे के लिए नरम पड़े स्वामी प्रसाद मौर्य, याद दिलाया अखिलेश का ‘पुराना वादा’
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के ‘इग्नोर हिम’ (उन्हें नजरअंदाज करो) वाले बयान के बाद दोनों नेताओं के बीच तल्खी जगजाहिर है। हालांकि, इन सबके बीच स्वामी प्रसाद मौर्य के तेवर अब अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ नरम पड़ते नजर आ रहे हैं।
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ऊंचाहार सीट का सियासी गणित: ऊंचाहार विधानसभा सीट से पूर्व में मनोज पांडे विधायक चुने गए थे, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो चुके हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य का दावा है कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने उनसे वादा किया था कि वे उनके बेटे के राजनीतिक भविष्य के लिए अवसर बनाएंगे और उसे सही जगह एडजस्ट करेंगे।
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स्वाभिमान बनाम बेटे का भविष्य: एक तरफ मौर्य का कहना है कि वे अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं करेंगे और न ही सपा से गठबंधन की ‘भीख’ मांग रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ, उनका यह भी मानना है कि यदि अखिलेश यादव ‘दरियादिली’ दिखाएं, तो राजनीति में पुरानी बातों को पीछे छोड़ा जा सकता है। वे व्यक्तिगत व्यवहार से भले आहत हों, पर बेटे के लिए रास्ते खुले रखना चाहते हैं।
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अपनी पार्टी के सिंबल पर चुनाव: स्वामी प्रसाद मौर्य ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में वे या उनकी पार्टी जो भी चुनाव लड़ेगी, वह केवल उनके अपने राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न पर ही लड़ा जाएगा, किसी अन्य दल के सिंबल पर नहीं।
यूपी में GST डिप्टी कमिश्नर अनुपमा सरोज का VRS मंजूर, क्या सिधौली से लड़ेंगी चुनाव?
2. INDIA गठबंधन में स्वामी प्रसाद मौर्य की राहें आसान नहीं, ओवैसी-चंद्रशेखर से जुड़ने की अटकलें
स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन की राहें फिलहाल आसान नजर नहीं आ रही हैं।
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आराधना मिश्रा ‘मोना’ का बड़ा बयान: स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही राहुल गांधी और कांग्रेस के माध्यम से ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में शामिल होने की उम्मीद लगाए बैठे हों, लेकिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस की वरिष्ठ नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने साफ कर दिया है कि फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं।
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सपा का कड़ा रुख और कांग्रेस की मजबूरी: अखिलेश यादव पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए सपा के दरवाजे बंद हैं। ऐसे में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी समाजवादी पार्टी को नाराज करके मौर्य को गठबंधन में शामिल करने का राजनीतिक जोखिम लेने से बच रहा है।
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तीसरे विकल्प की तलाश (ओवैसी और चंद्रशेखर): यदि ‘इंडिया’ ब्लॉक के दरवाजे पूरी तरह बंद होते हैं, तो स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी पार्टी के बैनर तले असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ (आजाद समाज पार्टी) के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में एक तीसरे मोर्चे के गठन की संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं।
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सपा छोड़ने की टीस: मौर्य का यह भी कहना है कि रामचरितमानस और धार्मिक बयानों के बाद पार्टी के भीतर उन्हें अलग-थलग किया गया और रामगोपाल यादव जैसे नेताओं द्वारा उन्हें घेरा गया, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में सपा छोड़नी पड़ी थी।
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3. सपा-कांग्रेस के बीच रणनीतिक खींचतान और यूपी का बदलता राजनीतिक परिदृश्य
प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में ‘इंडिया’ ब्लॉक के भीतर नेतृत्व, समन्वय और सीटों के बंटवारे को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच अंदरखाने रणनीतिक खींचतान जारी है।
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कांग्रेस पर भरोसा और गठबंधन की अनिवार्यता: स्वामी प्रसाद मौर्य का अभी भी मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ गठबंधन की कमान कांग्रेस पार्टी के हाथों में है और यदि भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त देनी है, तो तमाम विरोधी दलों को एकजुट होना ही होगा। उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस नेतृत्व ही तमाम सहयोगियों के हितों को साधते हुए अंतिम फैसला करेगा।
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सियासी नफा-नुकसान: एक तरफ जहां सपा अपने रुख पर पूरी तरह कायम है, वहीं कांग्रेस भी यूपी में अपने समीकरणों को साधने में जुटी है। ऐसे में छोटे दलों और क्षत्रिय-दलित-ओबीसी चेहरों को साथ जोड़ने या छोड़ने की इस रस्साकशी का आने वाले दिनों में यूपी के चुनावी मैदान पर गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
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