Political News : एकला चलो की राह पर मायावती

Dharmender Singh Malik
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कुमार कृष्णन

मुंबई में इंडिया गठबंधन की होने वाली तीसरी बैठक में यह उम्मीद की जा रही थी कि बसपा विपक्षी गठबंधन में शामिल हो सकती है। इन तमाम कयासों के बीच मायावती ने एकला चलो की राह पर चलने का फैसला किया है।लेकिन बसपा प्रमुख मायावती के इस वयान के बाद कि — बसपा किसी गठबंधन का ​हिस्सा नहीं बनने जा रही हैं,तमाम अटकलवाजियों पर विराम लग गया है।

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साफ तौर पर उन्होंने खुलासा किया​ कि एनडीए व इंडिया गठबंधन अधिकतर गरीब-विरोधी जातिवादी, साम्प्रदायिक, धन्नासेठ-समर्थक व पूंजीवादी नीतियों वाली पार्टियां हैं। जिनकी नीतियों के विरुद्ध बीएसपी अनवरत संघर्षरत है और इसीलिए इनसे गठबंधन करके चुनाव लड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
पार्टी का यह फैसला वेसे समय लिया गया है जब मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। फिर उसके कुछ अर्सा बाद ही 2024 में आम-चुनाव होंगे। भले ही मायावती ने ये घोषणा कर डाली है कि उनकी पार्टी आम चुनाव अकेले लड़ेंगी लेकिन जब चुनाव और क़रीब होगा
अपने पत्ते तब खोलेंगी।

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बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता में रही और हर बार इसकी एकमात्र सर्व शक्तिमान नेता मायावती मुख्यमंत्री बनीं। पार्टी की स्थापना 1984 में कांशी राम ने इस उद्देश्य के साथ की थी कि बहुजन समाज यानी दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ी जातियां(ओबीसी) और अल्प संख्यकों को सत्ता में बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।

स्वर्गीय कांशी राम ने पूर्व स्कूल अध्यापिका मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया। उनकी मौत के बाद बसपा का वजूद पूरी तरह मायावती के ऊपर ही टिक गया। उनके नेतृत्व को पार्टी में किसी और नेता की ओर से न तो चुनौती दी जा सकती है न ही कोई सवाल पूछा जा सकता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भर के बहुत से दलित उन्हें अपना नेता मानते हैं।
हालांकि पार्टी ने अपने सिद्धांतों की प्रेरणा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फूले, पेरियार ईवी रामासामी और छत्रपति शाहूजी महराज से हासिल की है, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव जीतने के बाद मायवती ने अपना लक्ष्य और दर्शन किसी भी तरह सत्ता हासिल करना बना लिया है।

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वर्षों से अब बसपा को एकजुट रखने वाली ताकत वही हैं। इसलिए अब तो उनके बिना बसपा की कल्पना भी करना नामुमकिन लगता है। जब तक कि वे अपने उत्तराधिकारी को तैयार करना शुरू नहीं कर दें ऐसा लगता है कि उनके सामने नहीं रहने पर पार्टी के तितर-बितर हो जाने में देर नहीं लगेगी। आज के समय में पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो उनकी अनुपस्थिति में इसे चला सके।

80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश आम चुनाव के लिहाज़ से सबसे बड़ा राज्य है। इस राज्य में 21 फ़ीसदी आबादी दलितों की है और दलितों के बीच मायावती की मजबूत पकड़ है।
बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती यूपी में अपनी पार्टी के आधार को मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रही हैं. 2024 के चुनावों से पहले मायावती अपने खोए हुए वोटरों को लाने की पूरी कोशिश कर रही हैं।

साढ़े तीन दशक के सियासी सफर में बहुजन समाज पार्टी का इतिहास रहा है कि वसपा को गठवंधन से हमेशा लाभ हुआ है।वह सूबे में अलग— अलग राजनीतिक दलों के साथ चुनावी जंग में उतरी। इसका लाभ बसपा को न सिर्फ हर बार मिला है, बल्कि सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाया। उत्तर प्रदेश के बाहर पार्टी को छत्तीसगढ़, पंजाब और बिहार तक में गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फायदा मिला। यह अलग बात रहा कि उसका गठबंधन टिकाउ नहीं रहा।

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1993 के चुनाव में पहली बार भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांशीराम और मुलायम सिंह ने हाथ मिलाया और प्रदेश से भाजपा सफाया कर डाला। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन 1995 में सपा— बसपा का गठबंधन टूट गया। 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी,लेकिन यह भाजपा के सहयोग से मुमकिन हो सका। फिर 1996 के विधानसभा चुनाव में बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी, इस चुनाव में पार्टी 33 सीटें जीतने में कामयाव रही। विधानसभा चुनाव के बाद वसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ लिया और 1997 में भाजपा के साथ मिलकर सरकार तो बना ली,लेकिन छह माह के अंदर गठबंधन टूट गया। 2000 से 2007 तक पार्टी लगातार मजबूत होती गयी और 2007 में पूर्ण वहुमत की सरकार बनाने में कामयाव रही।

लेकिन 2012 में सत्ता से बेदखल होने के बाद पार्टी का लगातार ग्राफ गिरता गया और 2014 के चुनाव में पार्टी का सफाया ही हो गया। 2019 में पार्टी ने फिर गठबंधन का रास्ता अख्तियार किया और सपा व आरएलडी के साथ चुनावी जंग में उतरी। इस गठबंधन का सबसे बड़ा लाभ मायावती को ही मिला। ​ पुन: दस सांसदों वाली पार्टी बन गयी। इस चुनाव के बाद मायावती ने इन दलों के साथ गठबंधन तोड़ लिया। इसका राजनीतिक नतीजा सामने है।

राजनीतिक लिहाज से देखें तो मायावती का दलित वोट बैक, वह खुलकर भाजपा के साथ नहीं जा सकती है। इसके कारण वह एनडीए का हिस्सा नहीं बन सकती है। भाजपा भी चाहेगी कि वह गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़े, ताकि जीत का रास्ता आसान हो।

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उत्तर प्रदेश में दलितों में 65 उपजातियां हैं। इनमें सबसे बड़ी आबादी जाटव समुदाय की है। कुल दलित आबादी का 50 फ़ीसदी हिस्सा जाटव हैं। मायावती ख़ुद इसी समुदाय से आती हैं। राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि जनीतिक विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि मायावती में इतना दम जरूर है कि वो आने वाले चुनाव में किसी गठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है। मायावती के एकला चलो की घोषणा का नुकसान इंडिया गठबंधन को ही होगा। यह स्थिति एनडीए के लिए अनुकूल होगी। बसपा उत्तर प्रदेश के बाहर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रही है। लोकसभा चुनाव भी वह इन दोनों पार्टियों और इनके एनडीए- इंडिया गठबंधन के खिलाफ लड़ेगी।

मगर मायावती के फैसले से उत्तरप्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की उम्मीद जगी है।सिर्फ दो दलों के गठबंधन का यूपी में बीजेपी पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। कांग्रेस संगठन अभी भी उत्तर प्रदेश् में कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रहा है। बहुजन समाज पार्टी ने इंडिया से दूर रहने का फैसला पिछले अनुभवों से लिया है। लोकसभा चुनाव के बाद जब सपा-बसपा गठबंधन टूटा था, तब दोनों ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाए थे। ऐसे में बसपा के किसी भी गठबंधन में जाने का संभावना अब नहीं दिखती है। फिलहाल वह हवा के रूख को भांप रही है,उसे देख कर ही वह अपना रास्ता अख्तियार करेगी।

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Editor in Chief of Agra Bharat Hindi Dainik Newspaper
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