बृज खंडेलवाल
गर्मी आते ही ताजमहल के साथ पर्यटक भी आगरा के प्रदूषित माहौल में ढंग से रोस्टेड होने लगते हैं। लू के थपेड़ों के साथ धूल की मार असहनीय हो जाती है। पत्थर इतने गर्म हो जाते हैं कि ऑमलेट बना लो।
किसी जमाने में जब यमुना नदी में बारहों महीने जल प्रवाह बना रहता था तो ताजमहल के पिछवाड़े में कुछ राहत मिल जाती थी। अब गंध भरी धूल, भिनभिनाते कीड़े, माहौल बिगाड़ रहे हैं।
विकास के नाम पर आगरा, जो कभी खूबसूरत स्मारकों का शहर था, अब विषैले पर्यावरणीय घेरे में घुट रहा है। मेट्रो विस्तार योजना ने ट्रैफिक जाम से प्रदूषण को और बढ़ा दिया है।
पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग और स्थानीय पर्यावरणविदों को अफसोस है कि भारत के प्रतिष्ठित मुकुट रत्न ताजमहल को पर्यावरणीय खतरे का सामना करना पड़ रहा है, इसका प्राचीन सफेद संगमरमर प्रदूषण और मानव-प्रेरित क्षय के निरंतर हमले का शिकार हो रहा है। स्मारक की खामोश चीख तत्काल हस्तक्षेप के लिए एक हताश अपील कर रही है मगर सुनवाई नहीं हो रही है।
लोग पूछते हैं क्या ताज के बगल में बहने वाली प्रदूषित यमुना नदी मुख्य दोषी है। इसका दूषित पानी संक्षारक हाइड्रोजन सल्फाइड छोड़ता है, जिससे संगमरमर का रंग पीला और काला हो सकता है। नदी की तलहटी में बने गड्ढों में कीड़े पनपते हैं, जिनके मलमूत्र से स्मारक और भी अधिक दागदार हो जाता है। अनियंत्रित औद्योगिक उत्सर्जन से मिलकर बना यह घातक रासायनिक हमला पहले से ही शामिल सल्फर डाइऑक्साइड को और खतरनाक बना रहा है।
पर्यटन, आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होते हुए भी, अपने आप में नुकसानदायक है। लाखों आगंतुक स्मारक की संरचनात्मक अखंडता को खतरे में डालते हुए टूट-फूट में योगदान करते हैं। दरारें, टपकता गुंबद और आक्रामक वनस्पतियाँ खतरे के बिंदु हैं और व्यापक संरक्षण की तत्काल जरूरत को इंगित करते हैं।
रिवर कनेक्ट कैंपेन के पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य मांग करते हैं: “यमुना पुनरोद्धार: औद्योगिक उत्सर्जन को रोकने और नदी के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए उन्नत सीवेज उपचार, भीड़ प्रबंधन: आगंतुकों की सख्त सीमा और दबाव को कम करने के लिए वैकल्पिक स्थलों को बढ़ावा देना, व्यापक संरक्षण: रखरखाव, संरचनात्मक मूल्यांकन और बहाली के लिए संसाधनों में वृद्धि।”
एम.सी. मेहता की जनहित याचिका से प्रेरित सुप्रीम कोर्ट के 1993 के हस्तक्षेप का उद्देश्य ताज को बचाना था। डॉ एस वरदराजन कमेटी की सभी बीस सिफारिशों पर अमल होना बाकी है।हरियाली सिर्फ 9 प्रतिशत बची है, उसमें भी ज्यादातर विलायती बबूल। क्या इत्तेफाक है जितना विकास हुआ उतना प्रदूषण बढ़ा। 1993 से आगरा की वायु गुणवत्ता में गिरावट ही आई है। यानी ज्यों ज्यों इलाज किया मर्ज बढ़ता ही गया। बढ़ते वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण, अवैध खनन, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के घातक मिश्रण ने शहर को प्रदूषण सिंक में बदल दिया है, जो लगातार आगरा की क्वालिटी ऑफ लाइफ को खराब कर रहे हैं।
अदालत के निर्देशों के तीन दशक बाद, आगरा का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) नियमित रूप से “खतरनाक” स्तरों को पार करता है, जो 400+ से अधिक है, खासकर गर्मियों के दौरान। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के अनुसार, PM2.5 का स्तर अक्सर 300 \mu g/m^3 को पार कर जाता है, जो WHO की सुरक्षित सीमा से छह गुना अधिक है। आगरा में वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जो 2000 में 500,000 से बढ़कर आज 1.8 मिलियन हो गई है, जिससे सड़कें दम घोंटने वाले गैस चैंबर में बदल गई हैं।
आगरा के प्रकृति प्रेमी कहते हैं, यमुना नदी, जो कभी शहर की जीवन रेखा थी, अब प्रदूषित नाला बन गई है। औद्योगिक उत्सर्जन और अनुपचारित सीवेज जलीय जीवन को नष्ट कर देते हैं और आर्द्रता बढ़ाते हैं, जिससे पार्टिकुलेट मैटर (PM) का जमाव तेज हो जाता है। उधर सूखी नदी की तलहटी धूल के अंधड़ों को बढ़ावा देती है, PM2.5 और PM10 जमा होने से संगमरमर का रंग खराब दिखता है। गैस उत्सर्जन संक्षारक एसिड बनाता है, जिससे गड्ढे बनते हैं। उतार-चढ़ाव वाली नमी और गर्मी नींव को कमजोर करती है।
2018 की ASI रिपोर्ट ने आने वाले वर्षों में एक अपरिवर्तनीय क्षति की चेतावनी दी थी, एक भयावह भविष्यवाणी जो वास्तविकता के करीब है। भारत की विरासत का प्रतीक ताजमहल एक पर्यावरणीय आपदा का सामना कर रहा है। नौकरशाही की उदासीनता, अनियंत्रित प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन इसे अपरिवर्तनीय क्षय की ओर धकेल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का 1993 का निर्देश एक चेतावनी थी; समय बीत रहा है। क्या ताज बच पाएगा, या यह हमारी पर्यावरणीय विफलताओं का स्मारक बन जाएगा?